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कृषि महाविद्यालय, रायपुर में प्राकृतिक कृषि एवं भारतीय पारंपरिक कृषि ज्ञान पर विशेष व्याख्यान आयोजित

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इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में आज प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि तथा भारतीय पारंपरिक कृषि ज्ञान के विभिन्न आयामों पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रो. ताराचंद बेलजी, संस्थापक-टीसीबीटी (ताराचंद बेलजी तकनीक) ने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को प्राचीन भारतीय कृषि ज्ञान, वृक्षायुर्वेद एवं पंचमहाभूत आधारित प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान की।

कार्यक्रम में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल, निदेशक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी, अधिष्ठाता, कृषि महाविद्यालय, रायपुर डॉ. आरती गुहे सहित विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के शिक्षकगण, वैज्ञानिक, अधिकारी तथा विद्यार्थी उपस्थित थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल ने अपने उद्बोधन में विद्यार्थियों को कृषि की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने तथा उन्हें वर्तमान कृषि चुनौतियों के संदर्भ में देखने के लिए प्रेरित किया।

विशेष व्याख्यान में प्रो. ताराचंद बेलजी ने भारतीय कृषि की प्राचीन ज्ञान परंपरा तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए कृषि करने की अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि परंपरा में कृषि को केवल उत्पादन की प्रक्रिया न मानकर मृदा, जल, वायु, वनस्पति, जीव-जंतुओं एवं मानव के बीच संतुलन स्थापित करने वाली समग्र व्यवस्था के रूप में देखा गया है।

उन्होंने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश अर्थात पंचमहाभूतों की कृषि व्यवस्था में भूमिका पर चर्चा करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने मृदा को कृषि उत्पादन का आधार बताते हुए मृदा स्वास्थ्य, प्राकृतिक उर्वरता तथा जैविक गतिविधियों के संरक्षण को टिकाऊ कृषि के लिए महत्वपूर्ण बताया।

प्रो. बेलजी ने वर्तमान कृषि के समक्ष मौजूद मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जल संकट, जलवायु परिवर्तन एवं कृषि लागत में वृद्धि जैसी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए प्रकृति आधारित कृषि पद्धतियों एवं भारतीय पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।

व्याख्यान के दौरान वृक्षायुर्वेद की भारतीय कृषि परंपरा में भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई। प्रो. बेलजी ने पौधों एवं वृक्षों के स्वास्थ्य, पोषण, वृद्धि एवं संरक्षण से संबंधित पारंपरिक ज्ञान के विभिन्न पहलुओं को विद्यार्थियों के साथ साझा किया।

उन्होंने स्थानीय संसाधनों एवं उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों के समुचित उपयोग तथा पारंपरिक कृषि अनुभवों को समझने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक कृषि विज्ञान एवं पारंपरिक भारतीय कृषि ज्ञान के बीच वैज्ञानिक समन्वय स्थापित कर अधिक टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणालियों के विकास की संभावनाओं को तलाशा जा सकता है।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य, पौध पोषण, पारंपरिक कृषि तकनीकों एवं टिकाऊ कृषि से संबंधित विभिन्न विषयों पर जिज्ञासाएं व्यक्त कीं। प्रो. बेलजी ने विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्हें कृषि के प्रति प्रकृति-सम्मत एवं समग्र दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

यह व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए भारतीय कृषि की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को समझने तथा वर्तमान कृषि चुनौतियों के संदर्भ में उसकी संभावित उपयोगिता पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर था।

कार्यक्रम के अंत में अधिष्ठाता, कृषि महाविद्यालय, रायपुर डॉ आरती गुहे ने आभार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में कृषि महाविद्यालय, रायपुर के शिक्षकगण, वैज्ञानिक, अधिकारी, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय पारंपरिक कृषि ज्ञान प्रणालियों से परिचित कराना तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि के प्रति जागरूक करना था।

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