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विशेष लेख : पशुधन से समृद्धि की ओर: विभागीय सहयोग ने ग्रामीण पशुपालकों के सपनों को दी नई उड़ान

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अम्बिकापुर : विशेष लेख : पशुधन से समृद्धि की ओर: विभागीय सहयोग ने ग्रामीण पशुपालकों के सपनों को दी नई उड़ान’

 

 

 

नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान और शासकीय योजनाओं का मिला संबल

पशुपालन बना स्वरोजगार और बढ़ती आय का सशक्त माध्यम

(विशाल कुमार जायसवाल

सहायक सूचना अधिकारी अम्बिकापुर)

अम्बिकापुर 29 सितम्बर 2026

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन केवल परंपरागत व्यवसाय नहीं, बल्कि स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और परिवार की आर्थिक मजबूती का प्रभावी आधार बनता जा रहा है। वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों, उन्नत नस्लों, कृत्रिम गर्भाधान, बेहतर पशु प्रबंधन तथा शासकीय योजनाओं का लाभ मिलने से ग्रामीण पशुपालक अब पारंपरिक पशुपालन को व्यवस्थित और लाभकारी व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। पशुपालन विभाग की मैदानी सेवाएं, तकनीकी मार्गदर्शन और योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही सुविधाएं पशुपालकों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रही हैं।

इसी बदलाव की तस्वीर सीतापुर विकासखंड के ग्राम चलता निवासी दयासागर और लुंड्रा विकासखंड के ग्राम सिलसिला निवासी जयनाथ राम की सफलता की कहानियों में दिखाई देती है। दोनों ने अपनी परिस्थितियों के अनुरूप पशुपालन को अपनाया और विभागीय सहयोग एवं योजनाओं का लाभ लेकर इसे अपनी आजीविका को मजबूत करने का माध्यम बनाया।

कृत्रिम गर्भाधान से बेहतर नस्ल और बढ़ा दुग्ध उत्पादन

दयासागर कई वर्षों से देसी गायों का पालन करते आ रहे थे। पारंपरिक तरीके से पशुपालन करते हुए उन्होंने महसूस किया कि बेहतर नस्ल और वैज्ञानिक प्रबंधन से पशुओं की उत्पादकता को और बढ़ाया जा सकता है। इसी दौरान पशुपालन विभाग के अधिकारियों और मैदानी अमले से उन्हें कृत्रिम गर्भाधान (एआई) के माध्यम से नस्ल सुधार की जानकारी मिली।

विभागीय सलाह को अपनाते हुए दयासागर ने अपनी गायों में कृत्रिम गर्भाधान कराया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें बेहतर नस्ल के बछड़े-बछिया प्राप्त हुए। वर्तमान में उनके पास एचएफ, गिर और साहीवाल जैसी नस्लों की गायें हैं। नस्ल सुधार के साथ उन्होंने पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य, देखभाल और प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना शुरू किया।

इसका सीधा असर उनके दुग्ध उत्पादन पर पड़ा। दयासागर के अनुसार, वर्तमान में उनके यहां प्रतिदिन लगभग 15 से 20 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। दूध उत्पादन में वृद्धि से नियमित आमदनी बढ़ी है और परिवार के दैनिक खर्चों को पूरा करने के साथ बचत की संभावना भी बनी है।

दयासागर बताते हैं कि पशुपालन विभाग से मिलने वाली सलाह और समय-समय पर प्राप्त मार्गदर्शन ने उन्हें पशुपालन को नए तरीके से समझने में मदद की। उनके लिए नस्ल सुधार केवल बेहतर पशुधन प्राप्त करने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह उनकी आजीविका को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

योजना से मिला पशुधन, खुला स्वरोजगार का रास्ता

दूसरी ओर ग्राम सिलसिला, विकासखंड लुंड्रा निवासी जयनाथ राम के लिए पशुपालन विभाग की योजना स्वरोजगार का आधार बनी। उन्हें राष्ट्रीय पशुधन मिशन (छस्ड) योजना के अंतर्गत पशुपालन विभाग द्वारा 5 बकरियां एवं 1 बकरा प्रदान किया गया। योजना के माध्यम से मिले पशुधन को जयनाथ राम ने मेहनत और लगन के साथ आगे बढ़ाया। बकरी पालन को व्यवस्थित रूप से अपनाने के परिणामस्वरूप उन्हें लगभग 30 हजार रुपये का आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ। योजना से मिला पशुधन उनके लिए केवल सहायता नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और परिवार की आय बढ़ाने का अवसर बना। जयनाथ राम का अनुभव बताता है कि यदि जरूरतमंद पशुपालक को शुरुआती संसाधन, उचित मार्गदर्शन और मेहनत का साथ मिल जाए, तो पशुपालन ग्रामीण क्षेत्र में स्वरोजगार का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

नस्ल सुधार से लेकर पशुधन संवर्धन तक विभाग की भूमिका

पशुपालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने में केवल पशुधन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। पशुओं की उचित नस्ल, स्वास्थ्य, पोषण, प्रजनन, टीकाकरण, देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन का भी उतना ही महत्व है। इसी दिशा में पशुपालन विभाग द्वारा पशुपालकों को नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान, पशु स्वास्थ्य एवं प्रबंधन संबंधी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। कृत्रिम गर्भाधान जैसी तकनीक के माध्यम से पशुपालकों को बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुधन प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इससे आने वाली पीढि़यों में दुग्ध उत्पादन और पशुधन की गुणवत्ता में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं। दूसरी ओर, पशु स्वास्थ्य सेवाएं और विभागीय मार्गदर्शन पशुपालकों को पशुओं की बेहतर देखभाल के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

योजनाओं ने पारंपरिक पशुपालन को दिया व्यवसाय का स्वरूप

शासकीय योजनाओं का उद्देश्य केवल पशुधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों को स्थायी आजीविका के अवसरों से जोड़ना भी है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन जैसी योजनाओं के माध्यम से पशुपालकों को पशुधन आधारित गतिविधियों को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। वहीं नस्ल सुधार और कृत्रिम गर्भाधान जैसी विभागीय सेवाएं मौजूदा पशुधन की उत्पादकता और गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहयोग करती हैं।

इस तरह एक ओर जहां जयनाथ राम को योजना के माध्यम से बकरी पालन शुरू करने के लिए पशुधन मिला, वहीं दयासागर ने विभागीय तकनीकी सलाह के माध्यम से अपने पशुधन की नस्ल और उत्पादकता में सुधार किया। दोनों उदाहरण यह दिखाते हैं कि योजना, तकनीक, विभागीय मार्गदर्शन और हितग्राही की मेहनतकृइन चारों का समन्वय ग्रामीण आजीविका को नई दिशा दे सकता है।

सेवा, संबल और स्वावलंबन की ओर बढ़ते कदम

पशुपालन विभाग की सेवाओं का वास्तविक महत्व तब सामने आता है, जब उसका लाभ ग्रामीण परिवारों की जिंदगी में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है। दयासागर के यहां नस्ल सुधार के बाद बढ़ा दुग्ध उत्पादन और जयनाथ राम के लिए बकरी पालन से प्राप्त आर्थिक लाभ इसी परिवर्तन की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। इन सफलताओं के पीछे केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि पशुपालकों की मेहनत, सीखने की इच्छाशक्ति और विभागीय मार्गदर्शन को अपनाने की तत्परता भी महत्वपूर्ण है। विभागीय अमला जब गांव तक पहुंचकर पशुपालकों को नई तकनीक और बेहतर प्रबंधन की जानकारी देता है, तो वर्षों से चली आ रही पारंपरिक पशुपालन पद्धतियों में भी सकारात्मक बदलाव आने लगता है।

पशुपालन से आत्मनिर्भरता की नई राह

आज ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन तेजी से आय के वैकल्पिक और भरोसेमंद साधन के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। दूध उत्पादन, बकरी पालन और अन्य पशुधन आधारित गतिविधियां परिवारों को नियमित आय से जोड़ने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा करती हैं। दयासागर और जयनाथ राम की कहानियां इसी व्यापक बदलाव की दो अलग-अलग तस्वीरें हैं। एक ने कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार के माध्यम से अपने दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया, तो दूसरे ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत मिले पशुधन से बकरी पालन को स्वरोजगार का आधार बनाया। दोनों के अनुभव यह संदेश देते हैं कि सही मार्गदर्शन, उचित तकनीक, शासकीय योजनाओं का लाभ और निरंतर मेहनत से पशुपालन को आर्थिक उन्नति का मजबूत आधार बनाया जा सकता है।

पशुधन अब केवल ग्रामीण जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि समृद्धि की संभावनाओं का आधार बन रहा है। विभागीय योजनाओं और सेवाओं से मिला संबल, वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग और पशुपालकों की मेहनत मिलकर गांवों में स्वरोजगार की नई तस्वीर गढ़ रहे हैंकृजहां पशुपालन आजीविका का साधन भर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की राह बन रहा है।