Home छत्तीसगढ़ असम के बांस की बांसुरी से छत्तीसगढ़ मंत्रमुग्ध

असम के बांस की बांसुरी से छत्तीसगढ़ मंत्रमुग्ध

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संगीत एक ऐसी कला है, जो कानों में मधुर रस घोलती है। इंसान संगीत सुनकर तरोताजा हो जाता है। संगीत एक साधना है, जिसकी साधना में समय की कोई सीमा नहीं होती है। एक बार जो इस साधना में रम गया, उसके लिए पूरी जिंदगी कम पड़ जाती है। यूं तो संगीत में कई वाद्य यंत्र हैं, लेकिन बांसुरी का स्थान अलग है। जहां कई इलेक्ट्रिक वाद्य यंत्र होते हैं, वहीं एक बांस से बनी बांसुरी अपनी अलग पहचान रखती है, जो तीन प्राकार के होती है। इसकी स्वर लहरी ऐसी कि सुनते ही कानों में स्वर की शहद घुलने लगती है। राजधानी रायपुर के एक ऐसे ही कलाकार विवेक टांक हैं, जो कई सालों से बांसुरी वादन कर रहे हैं। उनके पास 24-30 बांसुरी का एक सेट है, जिससे वे बांसुरी वादन कर जलवा बिखेरते हैं।

विवेक टांक बांसुरी वादन के साथ खुद ही बांसुरी बनाते हैं। मैं आपको बताता चलूं कि विवेक अभी तक कई छत्तीसगढ़ी फिल्मों और हिंदी फिल्मों में बांसुरी बजा चुके हैं। हाल में आई छत्तीगढ़ी फिल्म मोहूं कुंवारा तहूं कुंवारी में बांसुरी बजाए हैं। इसके साथ ही कई बड़े गायक के साथ स्टेज शेयर कर चुके हैं। विवेक ने बताया कि उनके पहले गुरु उनके पिता रहे, जिन्होंने बांसुरी के गुर सिखाए। उनका कहना है- जब मैं छोटा था तो सुबह बांसुरी की आवाज से ही नींद खुलती थी और रात को बांसुरी की आवाज से ही नींद आती थी, क्योंकि मेरे पिता संतोष टांक हर दिन सुबह-शाम बांसुरी का रियाज किया करते थे। यही वजह है कि बांसुरी से इतना लगाव हो गया और उसी समय से बांसुरी बजा रहा हूं और बना भी रहा हूं। पिता की स्मृतियां जुड़ी हैं।

विवेक बांसुरी बनाने के लिए असम से बांस मंगवाते हैं, क्योंकि असम का बांस हल्का होता है और उससे ज्यादा सुरीली बांसुरी बनती है। उनका कहना है कि आज जो बाजार में बांसुरी मिल रही हैं, महंगी के साथ बेसुरी भी हैं। इससे सही सुर नहीं लग पाता है और सीखने वालों को सही बांसुरी नहीं मिल पाती है। बच्चे बहुत परेशान होते हैं। बांसुरी बनाना पूरी तरह से मेजरमेंट का काम है। अगर एक भी छिद्र गलत हो गया तो आवाज बेसुरी निकलती है। उन्होंने बताया कि बांसुरी के कई प्रकार होते हैं पर मुख्य तीन ही होते हैं, जिससे अलग-अलग धुन निकलती है। सभी की अलगअलग प्रवृति है, जिनमें सबसे छोटी चंचल और सबसे बड़ी शांत प्रवृति की है।

बांसुरी तीन प्रकार की, जो अलग-अलग गीत में आती हैं काम

बांसुरी वादक के पास यूं तो कई बांसुरी होती हैं, लेकिन इसमें मुख्य तीन प्रकार ही होती हैं। जो मुख्य होता है। सबसे छोटी बांसुरी चंचल प्रवृति की होती है, जिसकी साइज 22 सेंटीमीटर होती है। इसका लोक संगीत और ऐसे अन्य सांग में इस्तेमाल होता है। वहीं मध्यम साइज की बांसुरी की लंबाई 42 सेंटीमीटर होती है। इसकी प्रवृत्ति लाइट होती है यानी बहुत सुरीली होती है। इसका इस्तेमाल रोमांटिक सांग वगैरह में होता है। वहीं सबसे बड़ी बांसुरी, जिसकी साइज लगभग 90 सेंटीमीटर होती है, जिसकी आवाज बहुत ही भारी होती है यानी बेस आवाज के लिए इस्तेमाल की जाती है, जो शास्त्रीय संगीत वगैरह में बजाई जाती है।

एक बांसुरी में होते हैं आठ छिद्र

बांसुरी में कुल आठ छिद्र होते हैं, जिसमें पहला छिद्र मुंह के पास होता है, जिससे हवा फूंकी जाती है और छह छिद्र सरगम के होते है, जिन पर उंगलियां होती हैं। वहीं सबसे नीचे एक और छिद्र होता है, जो आठवां छिद्र है वो ट्यूनिंग के लिए होता है।

काफी कीमती होती है बांसुरी

बांसुरी की कीमत पांच सौ रुपये से लेकर 15 हजार तक होती है। बांसुरी खरीदते समय बहुत ध्यान देने की आवश्यकता होती है। बाजारवाद के इस दौर में बिना सुर वाली बांसुरी भी मिल जाती हैं, इसलिए बांसुरी खरीदते वक्त जरूर ध्यान दें कि बांसुरी ठीक है या नहीं

बांसुरी बनाना मेजरमेंट का है फंडा

बांसुरी बनाना केवल बांस में होल कर देना भर नहीं है। इसमें मेजरमेंट का फंडा होता है। अगर एक भी होल गलत हो गया तो फिर वह बांसुरी बेसुरी हो जाती है। विवेक ने बताया कि यूं तो बांसुरी बनाने में ज्याद वक्त नहीं लगता है, लेकिन ट्यूनिंग मिलाने में बहुत समय लगता है। साथ ही एक भी गलत जगह होल हो जाता है तो पूरी मेहनत बर्बाद हो जाती है।

बांसुरी बनाने में बरतनी पड़ती है बड़ी सावधानी

बांसुरी बनाते वक्त बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, नहीं तो बांस फट भी सकता है। क्योंकि बांस में ज्यादा होल होने के कारण बहुत नाजुक होता है, जो थोड़ा सा टक्कर या दबने से क्रेक हो जाता है।