Home जानिए भारत में विख्‍यात हुईं ये 3 आध्यात्मिक विदेशी महिलाएं जो

भारत में विख्‍यात हुईं ये 3 आध्यात्मिक विदेशी महिलाएं जो

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भारत एक महान देश है इसके दर्शन, धर्म और वातावरण से प्रभावित होकर कई लोग यहां चले आते हैं। हालांकि कई महिलाएं ऐसी भी थीं जिनके भारत आने के और भी कई कारण थे। वर्तमान में हजारों की संख्या में विदेशी महिलाएं भारत में रह रही हैं। आओ जानते हैं ऐसी 3 विदेशी महिलाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी जानकारी जिन्होंने हिन्दू धर्म का सम्मान बढ़ाया।

1.एनी बेसेंट-

आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से सोए हुए भारत को जगाने के लिए भारत को अपना घर कहने वाली एनी बेसेंट ने दुनियाभर के धर्मों का गहन अध्ययन किया। उन धर्मों को जाना-परखा और बाद में समझा कि वेद और उपनिषद का धर्म ही सच्चा मार्ग है। एनी का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ। उनका जन्म नाम एनी वुड था। वे थियोसॉफी सोसाइटी से जुड़ी हुई थी जिसे मादाम ब्लावाटस्की ने प्रारंभ किया था। 24 दिसंबर 1931 को अड्यार में अपना अंतिम भाषण दिया। 20 सितंबर 1933 को शाम 4 बजे, 86 वर्ष की अवस्था में, अड्यार, चेन्नई में देह त्याग दी। 40 वर्ष तक भारत की सेवा करके उसे आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से जगाने के लिए उन्हें धन्यवाद।

2.सिस्टर निवेदिता-स्वामी विवेकानंदजी की शिष्या सिस्टर निवेदिता पूरे भारतवासियों की स्नेहमयी बहन थीं। सिस्टर निवेदिता का असली नाम मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल था। 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में जन्मी मार्गरेट नोबुल बचपन से ही ईसा मसीह के उपदेश रोम-रोम में बसे थे लेकिन बाद में ईसाई मत के सिद्धांतों के लिए उनके दिल में कुछ संदेह पैदा हो गए थे। कुछ बड़ी हुईं तो बुद्ध साहित्य पढ़ने पर बेहद प्रभावित हुईं।

इसी बीच 1893 में जब स्वामीजी विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने शिकागो पहुंचे तो वहां उनके विचारों से प्रभावित होकर मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल ने मन ही मन स्वामीजी को अपना गुरु मान लिया। स्वामी जी के प्रभाव से वे जनवरी 1898 में भारत आईं। यहाँ आकर कलकत्ता के बेलूर आश्रम में रहने लगीं और उन्होंने यहां की जनता की तन, मन, धन से नि:स्वार्थ सेवा की। 25 मार्च 1898 के दिन मार्गरेट नोबुल का नामकरण संस्कार हुआ और उनका नाम निवेदिता रखा गया। सिस्टर निवेदिता ने जिस छोटे से विद्यालय की नींव रखी थी आज यह विद्यालय ‘रामकृष्ण शारदा मिशन भगिनी निवेदिता बालिका विद्यालय’ के नाम से जाना जाता है। 13 अक्टूबर 1911 को पर चिरनि‍द्रा में लीन हो गई।

3.श्रीमाता-फ्रासंसी मूल की श्रीमाता का जन्म नाम मीर्रा अल्फासा था। वह श्री अरविंदों की शिष्या थीं। वे अरविंदों के पुद्दुचेरी आश्रम में रहती थीं। श्रीमां का जन्म 1878 में पैरिस में हुआ था। उनके पिता टर्किस इहुदी मरिस तथा मा‍ता माथिलडे इजिप्टियन थीं। 1914 में वह अरविंदों आश्रम आ गई। 1920 में वह अरविंदों आश्रम की मार्गदर्शक बन गई थीं।