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संघर्ष से समृद्धि की ओर : बरमकेला के विद्याधर यादव ने भेड़ और गाय पालन से गढ़ी स्वरोजगार की नई इबारत

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रायपुर : संघर्ष से समृद्धि की ओर : बरमकेला के विद्याधर यादव ने भेड़ और गाय पालन से गढ़ी स्वरोजगार की नई इबारत

 

 

 

 

 

रायपुर, 25 अगस्त 2026

ग्रामीण इलाकों में खेती के साथ पशुपालन किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक अहम जरिया है। खासकर भेड़ पालन को कम जगह और अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों में शुरू किया जाने वाला व्यवसाय माना जाता है। ऊन और मांस के जरिए भेड़ पालक अच्छी आमदनी हासिल कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्र में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। पशुपालन से जुड़े लोगों के लिए भी आर्थिक सहायता का प्रावधान भी है। भेड़ पालन में चारे का खर्च बहुत कम आता है क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से घास और स्थानीय चारे पर जीवित रह सकती हैं।  गाय पालन से नियमित दूध उत्पादन होता है, जिससे किसानों को हर महीने निश्चित आय मिलती है।

पशुपालन आजीविका और आत्मनिर्भरता का एक सशक्त जरिया

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में पशुपालन आज भी आजीविका और आत्मनिर्भरता का एक सशक्त जरिया बना हुआ है। मवेशी केवल खेती-किसानी और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा ही नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन में भी अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। इसी सोच को आत्मसात करते हुए बरमकेला विकासखंड के ग्राम देवगांव निवासी विद्याधर यादव और उनके परिवार ने भेड़ व गाय पालन को स्वरोजगार के रूप में चुनकर सफलता की एक नई कहानी लिखी है।

सुव्यवस्थित ढंग से पशुपालन का प्रबंधन

विद्याधर यादव के पास वर्तमान में लगभग 70 भेड़ें और 1 दूध देने वाली गाय है। वे केवल पारंपरिक तरीके से पशुपालन नहीं कर रहे, बल्कि बेहद सुव्यवस्थित ढंग से इसका प्रबंधन भी संभालते हैं। भेड़ों को चराने के दौरान हिंसक जानवरों और आवारा कुत्तों से सुरक्षा के लिए उन्होंने दो विदेशी नस्ल के कुत्ते पाल रखे हैं। इतना ही नहीं, अपने इस व्यवसाय के जरिए उन्होंने गांव के दो अन्य लोगों को भी सुबह-शाम चरवाहे के रूप में रोजगार दे रखा है। पशुधन विभाग के कर्मचारी भी नियमित रूप से उनके घर पहुंचकर पशुओं का टीकाकरण और स्वास्थ्य परीक्षण करते रहते हैं।

पशुपालन से प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख रुपये की आमदनी

अपनी इस मेहनत और लगन के बदौलत विद्याधर यादव को पशुपालन से प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख रुपये की आमदनी हो रही है। इसमें से चारे और चरवाहों के खर्च के रूप में लगभग 50 हजार रुपये निकालने के बाद भी उनके पास एक अच्छी-खासी शुद्ध आय बच जाती है। हाल ही में पशुधन विभाग के उप संचालक  ने विद्याधर के घर पहुंचकर उनके पशुधन के रखरखाव का जायजा लिया और उनके इस प्रयास की खुलकर सराहना की।

पशुपालन के जरिए स्वरोजगार के नए द्वार खोले जा सकते हैं

विद्याधर यादव का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पशुपालन के जरिए स्वरोजगार के नए द्वार खोले जा सकते हैं। इसके लिए बस पूरे परिवार की मजबूत इच्छाशक्ति, पशुओं के प्रति प्रेम और उनके रखरखाव व बीमारियों की सही जानकारी होना जरूरी है। आज विद्याधर यादव का पूरा परिवार पशुपालन के दम पर निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर है और ग्रामीण अंचलों में आत्मनिर्भरता की एक चमकती हुई मिसाल बन चुका है।