Home राजनीति नज़रिया : पुलवामा हमले के बाद प्रियंका गांधी की चुप्पी के मायने

नज़रिया : पुलवामा हमले के बाद प्रियंका गांधी की चुप्पी के मायने

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उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के 11 उम्मीदवारों की लिस्ट आई तो कार्यकर्ताओं से लेकर पत्रकारों की निगाहें लिस्ट में प्रियंका गांधी के नाम को खोज रही थीं.

माना जा रहा था कि ख़राब स्वास्थ्य की वजह से सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ेंगी और उनकी जगह प्रियंका गांधी वाड्रा चुनावी समर में कूदेंगी.

लेकिन कांग्रेस की पहली लिस्ट में प्रियंका का नाम नहीं है.

रायबरेली से सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के पुराने दिग्गज अपनी-अपनी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं.

2014 की मोदी लहर में कांग्रेस रायबरेली और अमेठी ही बचा पाई थी.

प्रियंका कांग्रेस की मजबूरी?

इसी साल जब प्रियंका गांधी की सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा हुई थी तो क़यास लगाए जा रहे थे कि वो विपक्षी पार्टियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनेंगी.

जानकार मानते हैं कि प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाना कांग्रेस की मजबूरी भी थी.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में गठबंधन की घोषणा ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थी.

उत्तर प्रदेश की इन पार्टियों ने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को नज़रअंदाज़ किया. ऐसे में कांग्रेस के सामने विपक्ष के रूप में सिर्फ़ बीजेपी नहीं, बल्कि उनके पुराने सहयोगी भी थे.

सपा और बसपा से मिले इस सबक से कांग्रेस ने शुरुआत में उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की है. हालांकि उन्होंने अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन की ओर इशारा भी किया है.

प्रियंका गांधी के आगमन से एक बार फिर न केवल कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह आया, बल्कि मीडिया में भी कांग्रेस फिर से ख़बरों से आ गई.

ख़ास तौर से जब प्रियंका गांधी को जिस क्षेत्र की ज़िम्मेदारी दी गई यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश वहां पर उनका सीधा मुक़ाबला नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ से है.

साथ ही कांग्रेस ने सपा-बसपा गठबंधन को भी इशारा किया वो उन्हें हल्के में ना लें.

प्रियंका का उत्तर प्रदेश दौरा

प्रियंका गांधी ने पार्टी दफ़्तर में आने के बाद ज़ोर-शोर से काम शुरू किया. उनका चार दिन का उत्तर प्रदेश दौरा मीडिया की सुर्खियों में रहा.

राजनीति में औपचारिक एंट्री के बाद लखनऊ के पहले दौरे में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने चार दिन और पांच रातों के दौरान पार्टी के चार हज़ार से अधिक कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की.

जिस दिन प्रियंका मीडिया से बात करना चाहती थीं उसी दिन पुलवामा में हमला हो गया. तब प्रियंका गांधी ने मीडिया के सामने कहा कि ये समय राजनीति की बात करने का नहीं है. उसके बाद प्रियंका ख़बरों की सुर्खियों से ग़ायब हो गईं.

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि देश में जब-जब संकट के बादल छाए हैं तब-तब कांग्रेस ने राजनीति छोड़ कर देश हित में काम करती है.

पुलवामा हमले के वक़्त प्रियंका गांधी का राजनीति पर बात न करना इस बात को दर्शाता है कि वो राजनीतिक रूप से परिपक्व हैं.

हालांकि कांग्रेस ने इस बहाने बीजेपी पर भी निशाना कसा था कि जब देश में गंभीर हमला हुआ तब बीजेपी के शीर्षस्थ नेता प्रचार में लगे रहे.

कार्यकर्ताओं से नज़दीकी

शुरू से माना जाता है कि प्रियंका गांधी कार्यकर्ताओं में काफ़ी लोकप्रिय हैं. कांग्रेस के ज़्यादातर नेता जब कार्यकर्ताओं से बात करने के बजाय उनको निर्देश देने में लगे रहते हैं, प्रियंका गांधी उनके साथ बैठ कर उनकी बातें सुनती हैं.

कार्यकर्ताओं के ज़रिए वो ज़मीनी हक़ीक़त तो पता करती ही हैं साथ ही उनका मनोबल बढ़ाने के दौरान उनकी बातें सुनती हैं और साथ फ़ोटो खिंचवाती हैं.

छोटे दल और असंतुष्टों पर नज़र

कार्यकर्ताओं को समय देने के साथ-साथ उन्होंने अलग-अलग पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को अपनी तरफ़ जोड़ना शुरू किया. इस कड़ी में पहला नाम महान दल के नेता केशव देव मौर्य का है.

केशव देव मौर्य पहले बहुजन समाज पार्टी में थे और उनकी पैठ कुशवाहा, निषाद, नाई, राजभर समाज में है जो कि पिछड़ों में यादवों के बाद सबसे बड़ी आबादी हैं.

इसी कड़ी में बीजेपी की बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले को भी कांग्रेस के साथ जोड़ लिया.

दलित नेता की पहचान रखने वालीं फुले क़रीब एक साल से ज़्यादा समय से बीजेपी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रही हैं. उन्होंने बीजेपी को ‘दलित विरोधी’ भी क़रार दिया था.

पिछले साल दिसंबर में उन्होंने बीजेपी पर समाज में बंटवारे की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था.

सावित्री बाई फुले के साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता और फतेहपुर से पूर्व सांसद राकेश सचान भी कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

कांग्रेस के लिए इन दोनों नेताओं को अपने साथ करना उनकी बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है.

जानकारों का मानना है कि अपने-अपने इलाक़े में अच्छी पैठ वाले नेताओं को जोड़ने से कांग्रेस के वोटों में इज़ाफ़ा होगा.

कांग्रेस में हर सीट पर समन्वयक

इसके साथ ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के लिए सभी सीटों पर समन्वयक की तैनाती कर दी है.

मैदान में उतारने से पहले इन समन्वयकों को कम्प्यूटर से लेकर चुनाव प्रबन्धन आदि की ट्रेनिंग दी गई है.

अमेठी, रायबरेली की तर्ज़ पर नियुक्त पार्टी के ये समन्वयक अपने-अपने क्षेत्रों में चुनाव और पार्टी नेताओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी गतिविधियों पर नज़र रखेंगे.

ऐसा प्रयोग मध्य प्रदेश में हो चुका है.

समन्वयकों की तैनाती में युवाओं और एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस में रहे नेताओं को तरजीह दी गई है.

इनकी सीधी रिपोर्टिंग प्रियंका गांधी को होगी. ये समन्वयक प्रियंका की आंख और कान होंगे.

प्रियंका के चुनावी अभियान की टीम

अपने चुनावी अभियान को गति देने के उद्देश्य से प्रियंका गांधी ने प्रोफ़ेशनल लोगों की एक टीम गठित की है. इसमें रॉबिन शर्मा सलाहकार की भूमिका निभाएंगे.

रॉबिन प्रशांत किशोर की अगुवाई वाले सिटीजन फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) के को-फाउंडर हैं और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आई-पीएसी) से जुड़े हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की ‘चाय पे चर्चा’ के पीछे रॉबिन शर्मा का ही दिमाग़ था.

इसके अलावा 2015 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की ‘हर घर नीतीश, हर मन नीतीश’ नाम से निकाली गई साइकिल यात्रा और 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में राहुल गांधी के ‘खाट सभा’ अभियान के पीछे भी रॉबिन शर्मा ही थे.

कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस प्रियंका और ज्योतिरादित्य से बड़ी रैली करवाने के बजाय नुक्कड़ सभा, मोहल्ला सभा, चौपाल और रोड शो में ज़्यादा ध्यान देना चाहती है.

कांग्रेस का मानना है कि बड़ी सभाओं के बजाय छोटे प्रोग्राम कर क़रीब से और पुख्ता तरीक़े से अपनी बात जनता के बीच रखी जा सकती है.

प्रियंका वैसे भी बड़ी रैलियों के बजाय छोटी-छोटी सभाओं को पसंद करती है.

प्रियंका का रोड शो का रूट ऐसा रखा जाएगा ताकि एक लोकसभा क्षेत्र का ज़्यादा-से-ज़्यादा हिस्सा कवर हो जाए.

हालांकि 14 फ़रवरी के बाद से देश की राजनीति में काफ़ी परिवर्तन आया है.

पुलवामा हमला और उसके बाद भारत सरकार की जवाबी कार्रवाई को बीजेपी ने अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की है.

जानकारों का मानना है कि किसी भी देश में सुरक्षा से ज़्यादा कोई बड़ा मसला नहीं होता. यही वजह है कि रफ़ाल, बेरोज़गारी और किसान जैसे मुद्दे एकदम पीछे हो गए.

वैसे भी बालाकोट के हवाई हमले को बीजेपी राजनीतिक रूप से लगातार भुना भी रही है.

ऐसे में कांग्रेस क्या रणनीति अपनाएगी यह काफ़ी अहम होगा.

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