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इतिहास गवाह है कि चुनाव के अंतिम चरण में मंत्रालय में आग लगने के बाद सरकारें बदल गयी

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मोहम्मद ज़ाहिद
दिल्ली के शास्त्री भवन में आग लग गयी। इतिहास गवाह है कि चुनाव के अंतिम चरण में मंत्रालय में आग लगने के बाद सरकारें बदल गयी हैं।

बताईए भारत जैसे शक्तिशाली देश के एक अतिसंवेदनशील और अतिमहत्वपूर्ण बिल्डिंग अग्निशमन जैसी व्यवस्था से वंचित हो यह सोचना भी बेवकूफी है। अर्थात यह आग जानबूझ कर लगाई जाती है।

दरअसल सरकार जाने के आभास मिलने के बाद मंत्रालयों में आग लगने और उस आग में तमाम काड़ा बाड़ा जल कर राख कर दिए जाने का इतिहास रहा है। और वही इतिहास दोहराया जा रहा है।

नरेन्द्र मोदी के भाषण और ऊलजुलूल बयान बता रहे हैं कि वह हताश हो चुके हैं , विशेषकर पश्चिम बंगाल के 40 विधायकों से संपर्क होने का बयान बेहूदा तक था। सोचिएगा कि विरोधी दल के 40 विधायक यदि टूटने को तैय्यार बैठे हों तो कोई मुर्ख नेतृत्व ही होगा जो इसे 1 महीने पहले सार्वजनिक करेगा।

ऐसे ही तमाम मुद्दे जो मोदी-शाह द्वारा उछाले जा रहे हैं वह रंग ना पकड़ कर फुस्स होते जा रहे हैं , चुनाव के चार चरण के बाद भी सांप्रदायिकता और मुस्लिम विरोध का रंग भी गायब है , पाकिस्तान और उसके ज़रिए फैलाई घृणा भी चुनावी परिदृश्य से गायब है।

मुझे नरेन्द्र मोदी 2004 के अटल बिहारी बाजपेयी लग रहे हैं और अमित शाह आज के लाल कृष्ण आडवाणी। चुनाव हारते ही मोदी और अमित शाह के दुर्दिन शुरु हो जाएँगे और इनकी पार्टी के ही इनसे पीड़ित लोगों का इन पर आक्रमण शुरु हो जाएगा।

अगली सरकार इनके विरुद्ध जाँच और फिर कार्यवाही करे , इससे बचने के लिए ही मंत्रालयों में आग की सूचना 23 मई तक और भी आती रहेगी।