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शमी ट्री : घर में लगाएं तो शनि की कृपा, खेत में लगाएं तो बनेंगे ‘राजा’

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 उत्तर प्रदेश में छोंकर व शमी, पंजाब में जंड, राजस्थान में खेजड़ी, गुजरात में खिजड़ो, महाराष्ट्र में शेमा, कर्नाटक में ‘बन्नी’ नाम से पहचान बनाने वाली ‘शमी’ पर भगवान शिव का साक्षात वास होता है. ऐसे ‘शमी’ की पूजा ही नहीं, यह विभिन्न रोगों में भी लाभकारी है. मान्यता है कि इसे घर में लगाने से शनि की कृपा तो खेत में लगाने से धन—धान्य से घर का भण्डारा भरा रहता है, अर्थात राजा बनाती है. यह मिट्टी को कई पौष्टिक आहार देती है.

ग्रहों के राजा शनि को शांत करने वाले ‘शमी’ वृक्ष को भगवती का भी निवास माना जाता है. इसे शिवा, इशानी, लक्ष्मी, इष्टा, शुभकरी आदि नामों से भी जाना जाता है. इसे गमले में भी लगाया जा सकता है. शमी को किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है लेकिन उपयुक्त मौसम जुलाई-अगस्त ही है. मिट्टी को विभिन्न तत्व देने वाले शमी का पौधा यदि खेत के किनारे लगायें तो इससे कम लागत में अच्छी उपज मिलेगी.

कात्यायनी देवी से उत्पन्न

शमी धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए कात्यायनी देवी से उत्पन्न माना गया है. इस कारण इसे पवित्र गमले में या साफ जगह में लगाना चाहिए. इस पौधे के आसपास नाली का पानी या कूड़ा नहीं होना चाहिए. इस पवित्र पौधे को सफाई पसंद है. केमिकल फर्टिलाइजर का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इस पौधे को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती लेकिन धूप बहुत चाहिए. शमी का वृक्ष सदैव ऐसी जगह लगाएं, जहां आप अपने घर से निकलते समय उसे देख सकें. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निकलते समय आपके दाहिने हाथ की तरफ पड़े. इसे पूर्व दिशा या ईशान कोण में भी लगा सकते हैं. इसे छत पर भी लगाया जा सकता है.

मिट्टी को देता है दो सौ किग्रा नाइट्रोजन

शमी प्राकृतिक अनुकूलता के लिए भी बहुत उपयोगी है. पानी को भाप बनाकर (वाष्पोत्सर्जन) उड़ाने की इसकी आदत कम है. 24 घंटे यह मात्र.5 मिमी पानी ही उड़ाता है. इसके साथ ही यह प्रति वर्ष एक हेक्टयेर क्षेत्र में लगभग दो सौ किग्रा नाइट्रोजन को वायु से शोषित कर जमीन को कई तत्व उपलब्ध कराती है.

कुष्ठ रोग के साथ ही बुद्धवर्धक भी

शमी का गोंद मई-जून में निकलता है. इसको लड्डू में मिलाकर प्रसव के बाद महिलाओं को खिलाना काफी फायदेमंद होता है. चरक संहिता के अनुसार शमी का फुल गुरु, उष्ण, मधुर, रूक्ष और केशनाशक है. भावमिश्र ने लिखा है कि शमी कफ, खांसी, भ्रमरोग, श्वांस, कुष्ठ तथा कृमि नाशक है. यह बुद्धिवर्धक भी है.

अपच, गठिया रोग में भी आता है काम

इसके औषधीय गुणों का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि गर्भवती स्त्रियां फूलों को शक्कर के साथ लेती हैं तो गर्भपात का डर कम रहता है. इसकी छाल का लेप फोड़े-फुंसी पर लगाया जाता है. नाखून और दांतों का जहर हटाने के लिए भी इसके छाल का प्रयोग होता है. अपच, गठिया रोग, घावों, बवासीर, प्रमेह में भी यह फाददेमंद है.

खेत के लिए एंटीबायोटिक

शमी को खेत के किनारे लगाने पर फसलों के लिए भी काफी फायदेमंद है. इसका कारण है कि यह एंटीबायोटिक का काम करता है. इसका कारण है, इसकी पत्तियों में नाइट्रोजन 2.9 प्रतिशत, फास्फोरस 0.4 प्रतिशत, पोटेशियम 1.4 प्रतिशत, कैल्शियम 2.8 प्रतिशत पाया जाता है और पत्तियां जल्दी ही जमीन में सड़कर मिट्टी को फायदा पहुंचाती है. इससे खेतों में कम खाद के प्रयोग पर भी अच्छी फसलें होती हैं.