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अध्ययन से खुलासा- भारतीय, भूमध्यसागरीय मूल के निवासियों के हैं रूपकुंड झील के नरकंकाल

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हिमाचल पर्वत पर समुद्र तल से 5000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील वर्षों से एक उलझी हुई पहेली है. झील के चारों ओर कई सौ वर्ष पुराने नरकंकालों के अवशेष बिखरे पड़े हैं. वर्षों से ये रहस्य बना हुआ है कि ये नरकंकाल किनकी है और इनकी मौत कैसी हुई है. इसी वजह से यह कंकाल झील या रहस्यमयी झील के उपनाम से भी जाना जाता है.

हैदराबाद में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल की बदौलत उत्तराखंड की रहस्यमयी रूपकुंड झील से निकले नरकंकालों पर रहस्य से पहला पर्दा उठाया है. इंटरनेशनल वैज्ञानिकों के एक दल के मुताबिक, पूर्वी भूमध्यसागर से आई एक खास जाति की ये कब्रगाह जैसी है. जिसे यूरोपियन माना जा रहा है.

हालांकि, इसमें एक अन्य जाति के शामिल होने की बात भी कही जा रही है. कुछ भारतीय मूल के निवासी भी बताई जा रही है. इसमें कुछ अंश भारतीय, कुछ अंश यूरोप के और दक्षिण पूर्व के मिले हैं.

CCMB की जांच में हुए कई खुलासे
हैदराबाद में सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) में इन नरकंकालों के बारे में जांच की जा रही है. रूपकुंड झील के 71 कंकालों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए से पता चला कि वहां कई अलग-अलग समूह मौजूद थे. इसके अलावा इनके रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि सारे कंकाल एक ही समय के नहीं, बल्कि एक हजार सालों के अंतराल में झील में डाले गए थे.

इन नरकंकालों में दो प्रमुख आनुवंशिक समूहों का पता चला है. नरकंकालों के जेनेटिक अध्ययन से पता चला है कि ये भारतीय और भूमध्यसागरीय मूल के निवासी हैं. अब तक 38 कंकालों के अंश के अध्ययन से पता चला है कि 24 अंश भारतीय मूल के हैं. 14 अंश भूमध्यसागरीय के हैं, जिसमें ग्रीस, छोटा सा द्वीप है जो वर्तमान में क्रेत के नाम से जाना जाता है और कुछ अंश साउथ ईस्ट एशिया की है.

कंकालों में एक हजार साल का अंतराल
CCMB के वैज्ञानिक के मुताबिक, रूपकुंड झील में जो कंकाल मिले हैं वे आनुवंशिक रूप से खास समूह के लोगों के हैं. ये भी साफ किया गया है कि दो अलग-अलग घटनाओं में बड़ी संख्या लोग मारे गए. इस दौरान पूरे एक हजार साल का अंतराल है. जिस दौरान इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं.

CCMB के वैज्ञानिक के मुताबिक, रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि भारतीय और भारत के आसपास के मूल के निवासी के कंकाल के जो अंश मिले हैं, उनकी मौत करीब 1500 से 1700 साल पहले अलग-अलग समय में हुई है और भूमध्यसागरीय मूल के निवासी के जो कंकाल के जो अंश मिले हैं उनकी मौत करीब 300 से 400 साल पहले हुई है. सारे कंकाल एक ही समय के नहीं है, बल्कि एक हजार सालों के अंतराल में उनकी लाशें रूपकुंड झील में डाल दी गई होगी.

कई कहानियां और किंवदंतियां हैं प्रचलित
अब भी ये शोधकर्ताओं के लिए गुत्थी ही है कि किन परिस्थितियों में ये लोग इस झील तक पहुंचे और इनकी मौत क्यों हुई. किंवदंतियों के मुताबिक, कई दावे किये जा रहे हैं, जैसे कि पहले वाले दावे में ये नरकंकाल किसी व्यापारियों के हो सकते हैं, जो किसी प्राकृतिक आपदा में फंस कर झील में दफन हो गए होंगे. दूसरे वाले किसी राजा, रानी और उनके सेना के नरकंकाल हो सकते हैं, जो सैर पर गए होंगे, हो सकता है किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से झील में दफन हो गए होंगें.

वहीं, तीसरे वाले किसी सैन्य बलों की हो सकती है जो तिब्बत की तरफ जाते वक्त झील में दफन हो गए हों. चौथी किन्ही तीर्थ यात्रियों की हो सकती है जो नंदा देवी मंदिर जा रहे हों, झील के पास कुछ हुआ होगा जिससे उसमें दफन हो गए हों.

इसके अलावा इलाके में कई तरह की कहानियां भी इन मौतों को लेकर कही जाती हैं. इस पर CCMB के वैज्ञानिक ने कहा है कि ये नरकंकालों के अंश सैन्य बलों के नहीं हो सकते क्योंकि सैन्य बलों के कोई निशान नहीं मिले जैसे की उनकी शस्त्र वगैरह, राजा-रानी वाला दावा भी हम नकार रहे हैं क्योंकि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला. व्यापारियों और तीर्थ यात्रियों वाली दावा हो सकता है कि सही हो.