Home छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ : मजदूर मांगते हैं सुरक्षा उपकरण, प्रबंधन धकेल देता ठेकेदारों पर

छत्तीसगढ़ : मजदूर मांगते हैं सुरक्षा उपकरण, प्रबंधन धकेल देता ठेकेदारों पर

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बीएसपी हादसे ने एक बार फिर प्रबंधन की बखिया उधेड़ दी है। जिम्मेदार विभागों की लापरवाही से पूरा प्रबंधन कटघरे में खड़ा हो गया है। एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने की लत और आदत से आये दिन हादसे हो रह हैं। सिंटरिंग प्लांट-2 में दो कर्मचारी चपेट में आए और एक ने जान तक गंवा दी।

दूसरा जिंदगी-मौत से जूझ रहा है। सिंटरिंग प्लांट के कर्मचारियों ने जिम्मेदार अधिकारियों पर आरोप लगाया है कि हादसे का वे इंतजार करते हैं। व्यवस्था सुधारने की बात की जाती है तो वे ठेकेदार की जिम्मेदारी का वे एहसास कराते हैं। हादसा होने के बाद ठेकेदार पर फाइन काटकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं।

हिंदुस्तान स्टील इम्प्लाइज यूनियन-सीटू की टीम ने मौका-मुआयना किया। घटनास्थल का जायजा लेने के बाद मौके पर मौजूद रहे कर्मचारियों से फीडबैक लिया। यूयिन के महासचिव डीवीएस रेड्डी बताते हैं कि कर्मचारियों में काफी रोष है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि सुरक्षा उपकरणों को लेकर बातचीत के दौरान प्रबंधन हमेशा से यह कहती है कि इसका इंतजाम ठेकेदार को ही करके देना है।

किंतु अधिकांश समय में ठेकेदारों द्वारा सुरक्षा के पूरे उपकरण उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। इन दोनों के बीच में ठेका मजदूर पिसता जा रहा है। सुरक्षा के साथ-साथ ठेका देने की पद्घति का भी विपरीत असर ठेका मजदूरों पर ही पड़ रहा है। प्रबंधन नियमों का हवाला देकर अक्सर रिवर्स ऑक्शन से ठेका देती है। कम दर पर रिवर्स ऑक्शन लेने के बाद ठेकेदार भी माथा पीटते हैं। पूरे कार्य को सभी नियमों के साथ संपन्ना करा पाना मुश्किल होता है।

इस बात को प्रबंधन भी भली-भांति जानती है। लेकिन प्रबंधन गाइडलाइन एवं विजिलेंस का हवाला देकर इस नियम को बरकरार रखे हुए हैं। इसके चलते अक्सर ठेका मजदूर को उसके वास्तविक वेतन से कम वेतन मिलता है। जबकि ठेका मजदूरों को पूरा वेतन, समय पर मिले, इसे सुनिश्चित करना प्रबंधन की ओर से नियुक्त ऑपरेटिंग अथॉरिटी की जिम्मेदारी होती है।

जब कुछ होगा तो देखा जाएगा…

लोड टेस्ट में देरी की बात भी सामने आ रही है। कर्मचारियों का कहना है कि जिस क्रेन का पुली टूट कर गिरा है। उसके लोड टेस्ट की अवधि समाप्त हो गई थी। अर्थात एक माह पूर्व इस क्रेन का लोड टेस्ट किया जाना था, जो कि नहीं किया गया। कमोवेश यह स्थिति संयंत्र के कई अन्य जगहों में भी हैं। अधिकारियों की मानसिकता है कि ‘कोई घटना नहीं घट रही है तो चलने दो’ ‘जब कुछ होगा तो देखा जाएगा’। ऐसी ही मानसिकता से काम चल रहा है, जिसका नतीजा शनिवार को हुए दुर्घटना के रूप में सामने आया है।

मीडिया से रहो दूर, मिल-बैठकर कर लेंगे समाधान

सिंटर प्लांट की दुर्घटना एवं उस दुर्घटना में एक ठेका श्रमिक की मौत से बीएसपी की किरकिरी हो रही है। एक ठेका श्रमिक गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती है। इधर, प्रबंधन अपना पुराना रटा रटाया जवाब एवं तकिया कलाम शुरू कर चुका है। इस तरह की घटनाओं से संयंत्र बदनाम हो रहा है। इसीलिए इसका मिल बैठकर समाधान निकालना चाहिए। न कि अखबारों एवं अन्य सोशल मीडिया में चलाया जाना चाहिए। सीटू का मानना है कि अखबार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। वह अपना कार्य करता रहेगा। हमें गंभीरता से दुर्घटनाओं को होने से रोकने के लिए उपाय करते रहना है। हादसों को रोकने पर काम किया जाए, इससे बदनामी से बचा जा सकता है।

कहां जाती है फाइन वसूली की रकम

संयंत्र में स्थाई एवं निरंतर कार्यों को स्थाई श्रमिकों के द्वारा कराए जाने संबंधी कानून मौजूद है।

बावजूद इसके मैनपावर कम करने, ओपन मार्केट में निजी उद्योग क साथ कंपटीशन करने की केंद्र के दबाव से स्थाई कर्मियों को स्थाई कार्यों से हटाकर उस स्थान पर ठेका श्रमिकों को लगाना प्रारंभ कर दिया है। यह नियम विरुद्घ है।

सिंटर प्लांट-2 में जिस एग्जास्टर क्रेन में यह हादसा हुआ है। उस क्रेन को एक ठेका श्रमिक चला रहा था, जबकि नियमता संयंत्र के सभी क्रेनों को स्थाई कर्मियों के द्वारा चलाया जाना है।

मैनपॉवर कमी का हवाला देकर क्रेन को पीआरडब्ल्यू वर्कर्स से चलाने का कार्य पूरे संयंत्र में जोरों पर है।

सीटू नेताओं ने कहा कि जब भी किसी ठेका श्रमिक के कार्य के दौरान दुर्घटना होती है तो प्रबंधन ठेकेदार पर सुरक्षा को लेकर फाइन लगाता है।

जबकि उस फंड में से उस ठेका श्रमिक के परिवार को कुछ भी सहायता नहीं करता है।

काम कराने के लिए बीएसपी के अधिकारी, ठेकेदार के सुपरवाइजर की उपस्थिति सुनिश्चित कराना प्रबंधन की जिम्मेदारी होती है।

ठेका मजदूर किस-किस विभाग में किस-किस काम को करेगा। उसे भी सही तरीके से निर्धारण करना प्रबंधन की ही जिम्मेदारी होती है। अर्थात ठेका श्रमिक के कार्य के दौरान दुर्घटना होने या ठेका श्रमिक की दुर्घटना मौत होने पर प्रबंधन एवं वहां काम करवा रहे स्थाई कर्मचारी के ऊपर पुलिस केस होता है।

किंतु ठेकेदार के ऊपर पुलिस केस के साथ प्रबंधन फाइन भी वसूल करती है। प्रबंधन स्पष्ट करें कि ऐसे फाइन वसूल करने का क्या कारण है एवं वसूल किए गए फंड का क्या उपयोग करता है।

फाइलों में नियम-कानून, यूनियन करेगी जागरूक

संयंत्र के अंदर किस काम को ठेका श्रमिक एवं पीआरडब्ल्यू से कराना है। किस कार्य को स्थाई कर्मियों के द्वारा किया जाना है। इसके बारे में स्पष्ट रूप से नियम है। लगातार घटते मैनपावर एवं उत्पादन के बढ़ते दबाव से प्रबंधन ने पीआरडब्ल्यू ठेका श्रमिकों से उन सारे कार्यों को करवाना प्रारंभ कर दिया है, जिसे केवल और केवल स्थाई कर्मियों के द्वारा किया जाना है। जब कोई दुर्घटना या ब्रेकडाउन आता है तो सारे नियम सामने आ जाते हैं। नियम के तहत काम कराने के लिए मजदूरों के बीच यूनियन जागरुकता अभियान चलाएगी।