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राजधानी और तेजस दोनों ट्रेनें खड़ी हों तो किसे पहले रास्ता देगी रेलवे?

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लखनऊ और दिल्ली के बीच तेजस एक्सप्रेस जबसे चली है, तब से उसे लेकर कई खबरें उड़ रही हैं. उन्हीं में से एक है कि तेजस अगर किसी भी प्लेटफॉर्म से निकलेगी तो उसे सबसे पहले प्रायोरिटी दी जाएगी. यानी कि उसे ही सबसे पहले निकाला जाएगा.

अब इस बात में कितनी सच्चाई है?

तेजस भारत की पहली निजी सार्वजनिक साझेदारी (PPP- Public Private Partnership) के तहत चलने वाली ट्रेन है. इसे पहले कॉर्पोरेट ट्रेन भी कहा जा रहा है. इसमें मिलने वाली सुविधाएं लोगों का ध्यान तभी से खींच रही हैं जब से ये लॉन्च हुई है. चाहे वो इसका इंटीरियर हो, या फिर फ्लाईट अटेंडेंट्स की तर्ज पर इनमें ट्रेन अटेंडेंट्स का होना. इसकी टिकटें दूसरी ट्रेनों के बनिस्बत महंगी हैं, और कहा ये जा रहा है कि तेजस को बाकी सभी गाड़ियों के ऊपर प्रायोरिटी दी जाएगी.

तेजस के लॉन्च वाले दिन भी सोशल मीडिया पर काफी अटेंशन खींची थी इस ट्रेन ने.

किन ट्रेनों को प्रायोरिटी मिलती है?

फ़र्ज़ कीजिए, कि एक साथ एक स्टेशन पर या एक जगह दो से अधिक ट्रेनें इकठ्ठा हो रही हैं. या किसी लाइन पर दो ट्रेनें क्रॉस कर रही हैं. अब उनमें से कोई पहले जाएगी, कोई बाद में. ये कैसे तय होगा कि पहले कौन सी ट्रेन जाएगी? इसके लिए रेलवे के कुछ नियम हैं. भारतीय रेलवे के ऑपरेटिंग मैन्युअल के अनुसार ट्रेनों की वरीयता का क्रम ये है:

# किसी दुर्घटना स्थल पर राहत के लिए जा रही ट्रेन. इसे सबके ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी. चाहे कोई भी ट्रेन रास्ते में क्यों न हो.

# राष्ट्रपति और वीवीआईपी की ट्रेन. (भारत के राष्ट्रपति के लिए एक ख़ास ट्रेन चलती है, जिसे प्रेसिडेंशियल सैलून कहा जाता है. आखिरी बार इसमें एपीजे अब्दुल कलाम ने सफ़र किया था. उसके बाद इसे अनसेफ घोषित किया गया था. सरकार ने कहा नया सैलून बनवाने के लिए, लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने इसके लिए मना कर दिया था. अब रेल मंत्रालय आठ करोड़ की लगत से नया सैलून बनवायेगा, ऐसी खबरें आ रही हैं)

# उस जोन की ट्रेन जो सबसे भीड़भाड़ वाली समय में चल रही हो. जैसे अगर कोई वेस्टर्न लोकल ट्रेन है जिसका उस समय वहां स्टेशन से निकलना बेहद ज़रूरी है, तो उसे बाकी ट्रेनों के ऊपर प्राथमिकता मिलेगी. (रेलवे के अलग-अलग जोन होते हैं, जैसे उत्तर पूर्व, उत्तर पश्चिम, कोंकण इत्यादि)

# सुपरफ़ास्ट ट्रेनें. जैसे राजधानी, शताब्दी, दुरंतो, गतिमान एक्सप्रेस, गरीब रथ, तेजस. इनमें भी राजधानी को सबसे टॉप प्रायोरिटी पर रखा जाएगा. उसके बाद शताब्दी. फिर तेजस, गतिमान जैसी ट्रेनें आती हैं.

# मेल/ एक्सप्रेस ट्रेनें.

# मिलिट्री के लोगों के लिए चलाई जा रही स्पेशल ट्रेन (अगर इमरजेंसी कंट्रोल की तरफ से निर्देश दिए जा रहे हों तो)

# फास्ट पैसेंजर ट्रेन. (ये छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती हैं, लेकिन हर स्टेशन पर नहीं. इनकी स्पीड आम पैसेंजर ट्रेन्स से थोड़ी ज्यादा होती है.

#स्पेशल ट्रेनें

# पैसेंजर ट्रेनें

# मिक्स्ड ट्रेनें

# मिलिट्री स्टोर वाली ट्रेनें

# स्पेशल गुड्स ट्रेनें (सामान ले जाने वाली)

# बिना किसी शंटिंग के सामान ले जाने वाली ट्रेनें

# राहत कार्य से लौट रही ट्रेनें

# शंटिंग वाले ट्रेनें

# डिपार्टमेंटल ट्रेनें

कौन सी ट्रेन पहले जाएगी, इस का निर्णय काफी सोच समझ कर ज़रूरत के हिसाब से लिया जाता है

ये आम तौर पर ट्रेनों की वरीयता का क्रम होता है. लेकिन ये बात भी साफ़-साफ़ निर्देश के तौर पर कही गई है इस मैन्युअल में कि सुरक्षा के लिए इसमें बदलाव किए जा सकते हैं. कुछ चीज़ें हैं जिनपर ध्यान देने की बात कही जाती है:

# जो पैसेंजर ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंचने के करीब हो, उसे रोका नहीं जाना चाहिए. भले ही उसके साथ कोई एक्सप्रेस या फास्ट ट्रेन (जो लम्बी दूरी की है) का कनफ्लिक्ट क्यों न हो रहा हो. ऐसा इसलिए क्योंकि लम्बी दूरी वाली ट्रेन के पास अपना समय सुधारने का / मेकअप करने का समय होता है. वो समय पर अपने गंतव्य पहुंच सकती है. लेकिन अगर पैसेंजर को रोक दिया जाए तो उसके पास इतना समय नहीं होगा कि वो अपने गंतव्य पर समय से पहुंचे.

# अगर सिग्नल पर क्रासिंग है, और वहां ऐसी ट्रेन खड़ी है जो बिल्कुल अपने समय पर चल रही है, तो उसे ज्यादा देर नहीं रोका जाना चाहिए.

# अगर कोई ट्रेन तकनीकी गड़बड़ियों की वजह से लेट चल रही है, और आगे भी उसके लेट होने की आशंका है, तो आम तौर पर ठीक-ठाक या बिना किसी दिक्कत के चल रही ट्रेनों को उस पर वरीयता दी जाती है.

ये तो हमने बता दिया कि वरीयता की एक लिस्ट है जो फॉलो की जाती है. चाहे वो स्टेशन पर स्टेशन कंट्रोलर हों, या फिर ट्रेनों के रूट तय कर रहे कंट्रोलर. लेकिन अगर दो समान वरीयता वाली, या सेम ग्रुप की ट्रेनों में दिक्कत हो गई तो?

इसमें ये ध्यान रखा जाता है कि समय पर कौन सी ट्रेन चल रही है. जो समय पर होती है, उसे वरीयता मिलती है. जिस ज़ोन की वो ट्रेन होती है, उसे वरीयता मिलती है. अगर समान वरीयता की दो ट्रेनें आमने-सामने आ रही हैं, तो जिसका गंतव्य स्थान नज़दीक होता है, उसे वरीयता दी जाती है.

यानी दिल्ली से लखनऊ जाने वाली स्वर्ण शताब्दी और तेजस अगर किसी एक जगह पर एक साथ हों. तो दोनों में से उस ट्रेन को पहले सिग्नल दिया जाएगा जो समय पर चल रही है. इसी तरह मान लीजिए कि दिल्ली से रांची के लिए चली राजधानी और लखनऊ के लिए चली तेजस दोनों कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर आने वाली हैं. अब इन दोनों में उस ट्रेन को प्राथमिकता मिलेगी जो समय पर चल रही है और जिसका डेस्टिनेशन करीब है. इस स्थिति में चूंकि तेजस का डेस्टिनेशन यानी लखनऊ सिर्फ एक स्टेशन दूर है, इसलिए तेजस को पहले सिग्नल दिया जाएगा.

इसलिए तेजस की वरीयता वैसी ही है जैसी किसी भी सुपरफ़ास्ट ट्रेन की. राजधानी और शताब्दी के बाद इसी का नंबर आता है. लेकिन जैसा आपको हमने बताया, और भी कई कारक हैं जो ये तय करते हैं कि कौन सी ट्रेन किस स्टेशन/क्रासिंग/रूट से पहले निकलेगी.

इस बाबत दी लल्लनटॉप ने मिनिस्टर ऑफ स्टेट (रेलवेज) सुरेश अंगादी से बात की. उनसे पूछा कि तेजस को क्या सच में वरीयता दी जा रही है? क्या ऐसा कोई आधिकारिक निर्देश है उसे ये वरीयता देने का? उन्होंने बताया,

ऐसा कुछ नहीं है. तेजस के लिए लाइन क्लियर करने की कोई बात नहीं है. कोई स्पेसिफिक केस ऐसा सामने आ रहा हो, ऐसा भी नहीं है. ये हम भी सिर्फ मीडिया में ही देख रहे हैं. ये (तेजस) बाकी ट्रेनों की तरह ही है. इसमें सुविधाएं हैं, लोग उसके लिए पैसे दे रहे हैं. ट्रेन तो शताब्दी और बाकी ट्रेनों जैसी ही है. अगर ऐसा कहीं हो रहा है कि तेजस को प्रेफेरेंशियल ट्रीटमेंट दिया जा रहा है तो आप हमें बताइए. सरकार की तरफ से ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया है.

यानी सिग्नल के मामले में तेजस को कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता है और तय मैनुअल के हिसाब से ही उसे रास्ता दिया जाता है.