Home छत्तीसगढ़ संविधान भारतीय संस्कृति का एक तरह से जीवन दर्शन है-अन्नपुर्णा तिवारी

संविधान भारतीय संस्कृति का एक तरह से जीवन दर्शन है-अन्नपुर्णा तिवारी

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बिलासपुर। शासकीय कन्या महाविद्यालय बिलासपुर में संविधान दिवस पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रभारी प्रधानाचार्य संजय कुमार ने छात्र-छात्राओं को संविधान में उल्लखित मौलिक अधिकारों एवं कर्तव्यों के बारे में जानकारी दी।कार्यक्रम की अध्यक्षता कमलेश कुमार ने की व मुख्य वक्ता के रूप में उच्च न्यायालय की अधिवक्ता अन्नपूर्णा तिवारी रही।संविधान दिवस कार्यशाला के अवसर पर अन्नपूर्णा तिवारी ने संविधान निर्माता भारत रत्न बाबा ड़ॉ भीम राव अंबेडकर का स्मरण करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सभी को संविधान दिवस की शुभकामनांए दी।मुख्य वक्ता अन्नपूर्णा तिवारी ने संविधान दिवस पर अपने उद्बोधन में कहा कि संविधान हमारे देश का सर्वोच्च विधान है।इस बात को गहराई से समझने की जरूरत है कि यह नियम कानूनों का दस्तावेज भर नहीं है बल्कि यह वह पवित्र ग्रंथ है है जिससे विश्व के सबसे बड़े हमारे लोकतांत्रिक देश का संचालन होता है।भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।पूरी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तावना किसी संविधान की मानी गयी है तो वह हमारे देश की है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही स्पष्ट है कि संविधान की शक्ति सीधे जनता में निहित है। इसीलिए हमारे संविधान का प्रारंभ ही “हम भारत के लोग”शब्दों से होता है।संविधान में आया” हम भारत के लोग” केवल शब्द भर नहीं है। यह हमारी महान भारतीय संस्कृति का एक तरह से जीवन दर्शन है।भारतीय संविधान में नागरिक अधिकार है तो कर्तव्य भी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि कर्तव्यों के हिमालय से अधिकारों की गंगा बहती है।संविधान में दिए अधिकारों के प्रति हम जागरूक होते हैं परन्तु कर्तव्यों के प्रति उदासीन होते हैं।संविधान आजादी की मर्यादा है। इसलिए यह जरूरी है कि संवैधानिक मूल्यों, नैतिकता, मर्यादाओं और गरिमा के साथ साथ हम राग द्वेष एवं भेदभाव से मुक्त रहते हुए संविधान निर्माताओं की भावनाओं को सम्मान दे।संविधान दिवस के कार्यक्रम में उपस्थित विधि में रुचि रखने वाली छात्राओं ने संविधान की प्रस्तावना का वाचन कर संकल्प लिया कि हम हमारे महान संविधान निर्माताओं और राष्ट् निर्माताओं। को नमन करते हैं। हम साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखते हुए हम देश की एकता और अखंडता के लिए कार्य करेंगे।कार्यक्रम के अंत में रविन्द्र नाथ टैगोर की कविता का पठन किया गया। जहां दिन रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित करछोटे और छोटे आंगन न बनाएं जाते हो।जहां हर एक वाक्य हृदय की गहराई से निकलता हो।जहां हर दिशा में कर्म की अजस्र नदी के स्त्रोत फूटते हो और निरंतर अबाधित बहते हो।जहां विचारों की सरिता तुच्छ आधारों की मरू भूमि में न खोती हो।जहां पुरूषार्थ सौ-सौ टुकड़ों में बटा हुआ न हो।जहां पर सभी कर्म, भावनाएं आनंदानुभुतियां तुम्हारे अनुगत हो।हे पिता, अपने हाथों से निर्दयता पूर्ण प्रहार कर उसी स्वातंत्र्य स्वर्ग में इस सोते हुए भारत को जगाओ।।कार्यक्रम में राम नारायण साहू अधिवक्ता शिक्षक एवं शिक्षिकागण एवं छात्राएं उपस्थित रहीं।