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लोकसभा चुनाव 2019 : छत्तीसगढ़ में यूपी-बिहार जैसा नहीं है जाति का गणित

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‘तेली हैं हम और हममें है दम’

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे अभनपुर इलाके में एक नौजवान के सेलफ़ोन पर बज रहे तेली-साहू समाज को एकजुट करने की कोशिश वाले इस गीत को सुनते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस बार फिर चुनाव में जाति को आज़माने की कोशिश जारी है.

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने छत्तीसगढ़ दौरे में साहू जाति का कार्ड खेला और उसके बाद से तो जैसे राज्य में जाति की राजनीति को लेकर घमासान मचा हुआ है.

पीएम मोदी ने छत्तीसगढ़ की अपनी सभाओं में कहा, “नामदार गालियां दे रहे हैं. सारे मोदी को चोर कहते हैं. यहां का साहू समाज गुजरात में होता तो उन्हें मोदी कहते हैं. राजस्थान में होता तो राठौर कहते. तो सोचिए, सारे साहू चोर हैं क्या?”

नरेंद्र मोदी की सभा समाप्त होते-होते राज्य भर में साहू समाज के बीच इस भाषण की चर्चा शुरू हो गई. राज्य की 14 फ़ीसदी आबादी और लगभग एक-तिहाई सीटों पर निर्णायक वोटों वाले इस समाज की ओर से राज्य के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने कमान संभाली और सोशल मीडिया में अपना रिकॉर्डेड बयान जारी करते हुए कहा कि एक व्यक्ति की ग़लती पूरे समाज की ग़लती नहीं हो सकती.

राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट करके तंज कसा, “गुजरात में ‘चायवाला’, यूपी में जाकर ‘गंगा मां का बेटा’, छत्तीसगढ़ में आते ही ‘साहू’ और अंबानी के यहां जाते ही ‘चौकीदार’. साथियों, बहुरूपिए से सावधान रहें ! क्योंकि जैसे ही सावधानी हटी, वैसे ही पंचवर्षीय दुर्घटना घटी!! जानकारी और जागरूकता ही बचाव है. जय जोहार, जय कर्मा माता !”

इसके बाद से छत्तीसगढ़ में जाति को लेकर बयानों की भरमार आ गई है.

जाति की गहरी जड़ें

चुनावों में यह आम धारणा है कि बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सारा चुनावी समीकरण जाति के आस-पास घूमता है. लेकिन हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी एक-एक सीट का बंटवारा जाति के आधार पर ही होता है और राजनीति जाति की धुरी के आस-पास ही घूमती है.

जाति की प्रतिद्वंद्विता भले ही उत्तर प्रदेश, राजस्थान या बिहार जैसी न भी हो तो भी चुनाव में यहां जाति एक बड़ा आधार होता है.

छत्तीसगढ़ में 32 फ़ीसदी आदिवासी आबादी है और 13 फ़ीसदी अनुसूचित जाति. इसी तरह राज्य में 47 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आबादी है.

दोनों ही पार्टियों ने अन्य पिछड़ा वर्ग के चार-चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. एक-एक कुर्मी और एक-एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार दोनों ही पार्टियों की ओर से चुनाव मैदान में हैं. कांग्रेस ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है तो भाजपा ने भी.

छत्तीसगढ़ में लोकसभा का चुनाव प्रचार अपने चरम पर है और चुनाव के दूसरे चरण में गुरुवार को तीन सीटों पर मतदान होना है.

ज़ाहिर है, मतदाताओं को साधने के लिये राजनीतिक दल अपने सारे हथियार अपना रहे हैं और मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जाति कार्ड ने इन हथियारों को और धार दे दी है.

19 साल पहले बने छत्तीसगढ़ में किसी भी दल को यह मानने में अब गुरेज नहीं है कि जाति के नाम पर वोट राजनीति की बड़ी सच्चाई है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव कहते हैं, “जातिगत समीकरण पर भाजपा पूर्णतः नहीं चलती है लेकिन हम उसे नकार भी नहीं सकते. थोड़ा-बहुत समीकरणों को देखना ही पड़ता है. जहां जिस जाति की बहुलता है, वहां पर उस जाति को प्राथमिकता देते हैं. लेकिन केवल जातिगत आधार पर ही भाजपा चुनाव नहीं लड़ती है. जैसे साहू बहुल इलाके में भी हमने सामान्य जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है.”

हम जाति की राजनीति नहीं करते: कांग्रेस

दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी मानते हैं कि टिकट बंटवारे में जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा गया है, लेकिन वे इससे साफ़ इनकार करते हैं कि उनकी पार्टी जातिगत राजनीति करती है.

त्रिवेदी कहते हैं, “दरअसल भाजपा जब धर्म की राजनीति में असफल हो गई है तो अब जाति के नाम पर समाज को विभाजित करने की राजनीति कर रही है, जिसे छत्तीसगढ़ के लोग कभी पसंद नहीं करते.”

लेकिन पिछले कई सालों से अपनी जाति को लेकर तरह-तरह के आयोग और निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा झेल चुके छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का कहना है कि पहले जाति छत्तीसगढ़ में बहुत बड़ा मुद्दा नहीं हुआ करता था लेकिन पिछले तीन-चार सालों में पिछड़े वर्ग की जो जातियां हैं, उनमें एकजुटता बढ़ती जा रही है.

जोगी कहते हैं, “जातिगत समीकरण का महत्व अब बढ़ गया है. भाजपा, कांग्रेस और काफ़ी हद तक बसपा ने भी जातिगत समीकरणों को देख कर ही टिकट दिए हैं.”

‘जाति नहीं विकास है मुद्दा’

बिलासपुर स्थित गुरुघासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रमुख डॉक्टर अनुपमा सक्सेना मानती हैं कि छत्तीसगढ़ के चुनाव में जाति आधार तो है लेकिन यही एकमात्र आधार नहीं है.

पिछले कई चुनावों में तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोध और सर्वेक्षणों से जुड़ी रहीं डॉक्टर सक्सेना मानती हैं कि छत्तीसगढ़ की राजनीति के जातिगत समीकरण बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से अलग है.

वो कहती हैं, “दूसरे राज्यों में जाति व्यवस्था ज़्यादा जटिल है. इन राज्यों में कई बार तो जाति ही चुनाव में हार-जीत का भी निर्धारण कर देती है. यहां तक कि वहां जाति आधारित राजनीतिक दल भी विकसित हो गये हैं, जबकि छत्तीसगढ़ की राजनीति अभी भी दो राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है.”

अनुपमा सक्सेना का दावा है कि राज्य बनने के बाद से शासन और लोक कल्याण की नीतियां यहां चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं. राज्य में 15 सालों तक भाजपा की सरकार के काबिज़ रहने के पीछे विकास से जुड़ी योजनाओं की सफलता को वो बड़ा कारण मानती हैं.

उनका कहना है कि किसानों से जुड़े मुद्दों की भाजपा सरकार द्वारा अनदेखी और दूसरी लोक कल्याणकारी योजनाओं में आई गड़बड़ियों को लगातार कांग्रेस पार्टी ने उठाया और सरकार बनाने में सफल हुई.

छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने चुनाव बहिष्कार किया है

सत्ता और समाज में सहभागिता

हालांकि राजनीति और समाज की पड़ताल करने वाला एक बड़ा वर्ग मानता है कि पिछले कुछ सालों में जैसे-जैसे जीवन में कॉर्पोरेट का हस्तक्षेप बढ़ा है और रोजगार में कमी आई है, उसने भी जाति समाज को मज़बूती प्रदान की है.

पहले से ही सत्ता और समाज में अपनी सहभागिता से वंचित एक बड़े वर्ग के लिये जाति व्यवस्था ने सम्मान के साथ और बिना शर्त के समावेशन का अवसर उपलब्ध कराया है.

सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर विक्रम सिंघल कहते हैं, “छत्तीसगढ़ में आप इस बात पर ख़ुश हो सकते हैं कि यहां राजनीति में जातिगत समीकरणों के बाद भी उनमें तरलता बची हुई है. यानी पिछले साल किसी जाति ने किसी ख़ास पार्टी को वोट किया था वो इस साल किसी दूसरी पार्टी को वोट कर सकती है. यही कारण है कि यहां किसी भी पार्टी में किसी ख़ास जाति विशेष का कब्जा नहीं है जैसा कि हम बिहार या उत्तर प्रदेश में देखते हैं.”

हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता और एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म (एडीआर) के संयोजक गौतम बंद्योपाध्याय इसके पीछे राष्ट्रीय कारण भी देखते हैं.

गौतम बंद्योपाध्याय का कहना है कि पिछले तीन-चार चुनावों से राष्ट्रीय दलों ने अपने राजनीतिक अभियान को जाति की दिशा में तेजी से मोड़ा है.

आदिवासियों और वंचितों के बीच जल, जंगल और ज़मीन के मुद्दे पर काम करने वाले बंद्योपाध्याय कहते हैं कि इन संगठनों ने तरह-तरह की जातिगत पंचायतों को खाद-पानी देने का काम किया है, जिसके कारण जाति की राजनीति लगातार मजबूत होती चली गई है.

वो मानते हैं कि राजनीतिक दल, प्रत्याशियों के चयन से पहले से ही जातिगत संभावनाओं को टटोलते हैं और यही प्रक्रिया चुनाव के दौरान भी जारी रहती है.

गौतम बंद्योपाध्याय कहते हैं, “36-36 राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने वाले राष्ट्रीय दलों ने जाति आधारित राजनीतिक संगठनों को अपने साथ जोड़ कर रखा है. इसका असर दूसरे राज्यों में बसने वाली उन जाति विशेष पर भी पड़ना लाज़मी है.”

यह सच है कि जिन समस्याओं को महज सामाजिक समस्या की तरह देखा जाता है, उनकी जड़ें भी अंततः राजनीति में ही छुपी हुई हैं. ऐसे में राजनीति से जाति अगले कुछ सालों में जाती हुई नज़र आयेगी, इसकी संभावना तो कम ही है.