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भीषण गर्मी और सूखे की मार कुदरती या इसके पीछे है इंसानी हाथ?

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इस वक्त बिहार में चमकी बुखार से मर रहे बच्चों के अलावा अगर कोई बड़ी खबर है तो वो है भीषण गर्मी और लू की. झुलसा देने वाली गर्मी ने अब तक यहां करीब 200 लोगों की जान ले ली है, जबकि सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती हैं. औरंगाबाद में 60 से ज्यादा और गया में 35 से ज्यादा लोगों की जान चली गई है. हाल इतना बुरा हो गया है कि सरकार को सूबे में धारा 144 लागू करनी पड़ी.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने लोगों से तापमान कम होने तक बाहर ना निकलने की अपील की है. मौसम विभाग ने आधिकारिक रूप से माना है कि बिहार ही नहीं देश के तमाम हिस्से अभी लू की चपेट में हैं.

बिहार के अलावा विदर्भ, तटीय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मराठवाड़ा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और पुडुचेरी के कई इलाके भयंकर गर्मी की मार झेल रहे हैं, जो विकट लू की कैटेगरी में है.

मौसम विभाग ने जहां 18 जून को देश के कुछ हिस्सों में बारिश होने का अनुमान लगाया है, वहीं बिहार और बंगाल समेत देश के तमाम हिस्सों में लू जारी रहने की बात भी कही है.हाल ही में कई राज्यों में तापमान 45ºC से ऊपर चला गया. राजस्थान के चुरू में तो 1 जून को तापमान 50.8ºC रहा, जो राज्य में अब तक का सबसे ज्यादा तापमान था. 10 जून को दिल्ली में 48ºC तापमान के साथ नया रिकॉर्ड बना.

तेज गर्मी के साथ सूखे की मार ने गंभीर समस्या खड़ी की है. इस साल भारत का करीब 50 फीसदी हिस्सा सूखे की चपेट में है. उत्तर से दक्षिण तक पानी की काफी कमी है. चाहे चेन्नई हो या राजस्थान का कोई गांव, महाराष्ट्र का विदर्भ या मराठवाड़ा हो या फिर आंध्र प्रदेश या तेलंगाना का कोई गांव. सेंट्रल वॉटर कमीशन के मुताबिक, देश में 21 शहरों के 91 जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 20 फीसदी से भी कम पानी बचा है. मार्च और मई के बीच इस साल केवल 99 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई जो सामान्य से 23 फीसदी कम है.

यह पिछले 65 साल में मॉनसून से पहले की दूसरी न्यूनतम बारिश है. दक्षिण भारत में 47 फीसदी और उत्तर-पश्चिमी भारत में 30 फीसदी कम बारिश हुई है. महाराष्ट्र के विदर्भ में तो मॉनसून से पहले की बारिश 80 फीसदी कम हुई है.

भीषण गर्मी, सूखा और फिर बाढ़ हो या बार-बार आ रहे ताकतवर चक्रवाती तूफान, यह सब अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. इसके अलावा बेमौसमी बारिश, थोड़े वक्त में बहुत सारा पानी बरसना, ठंड का देर से आना और सर्दियों में आने वाली फुहारों का गायब हो जाना एक सामान्य अनियमितता हो गई है, जिसका असर खेती-बाड़ी से लेकर जीवन के हर हिस्से में पड़ रहा है. मौसम का यह असामान्य चक्र अर्थव्यवस्था से लेकर इंसानी वजूद का संकट पैदा कर रहा है.

लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी ग्लोबल वॉर्मिंग का असर दिख रहा है

सवाल यह है कि मौसम का यह क्रूर और मनमाना रूप क्या सिर्फ कुदरती मार है या इसके पीछे इंसानी हाथ भी है. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) की कांची कोहली इसके पीछे एक बड़ी वजह इंसानी करतूत को मानती हैं. साथ ही वह इसके पीछे गर्वनेंस का मुद्दा भी अहम मानती हैं. वह कहती हैं कि बिना योजना के शहरीकरण, भवन निर्माण में कंकरीट का जबरदस्त इस्तेमाल, पेड़ों की कटान, पानी की फिजूलखर्ची और प्रबंधन का अभाव इसके पीछे की बड़ी वजहें हैं.कांची कोहली, CPRपहाड़ों में जिस तरह के घर बने या शहरी इलाकों में जिस तरह हमने पानी जमीन से खींचा है, वेट-लैंड के ऊपर भवन निर्माण कर दिया है और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव जैसी वनस्पतियों को खत्म किया है. इसका असर मानवीय और वन्य जीवन पर काफी ज्यादा हो रहा है, जिसका सीधा संबंध मौजूदा संकट से है.

मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दिनों देश के ज्यादातर हिस्सों में शहरों का तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा. हिल स्टेशन भी सामान्य तापमान से काफी गरम हैं. ऐसे में मानसून की देरी या कमी का डर सबको सता रहा है. महाराष्ट्र सरकार ने तो अगस्त में “क्लाउड सीडिंग” के जरिए कृत्रिम बारिश कराने के लिए 30 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया है. मगर अहम बात वो है जिसकी ओर कोहली इशारा कर रही हैं यानी कुदरत के चक्र में इंसानी दखल.

दुनियाभर में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने ग्लोबल वॉर्मिंग को मौजूदा संकट की बड़ी वजह बताया है. जिसकी चलते ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है और समंदर का तापमान भी बढ़ रहा है. इसका असर लंबे सूखे की मार, असामान्य और बेवक्त बारिश, भयानक बाढ़ और चक्रवाती तूफानों की शक्ल में दिख रहा है.

देश में मौसम का बिगड़ैल मिजाज और उसका असर

साइक्लोन वायु को छोड़ भी दें तो पिछले 9 महीनों में 3 बड़े चक्रवाती तूफान भारत के तटों से टकराए हैं. अक्टूबर में चक्रवात तितली आया, जिसने करीब 3000 करोड़ रुपये का नुकसान किया. इससे 60 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए. इस तूफान की वजह से 60 से ज्यादा लोगों की जान गई. फिर नवंबर में गज की वजह से काफी तबाही हुई. इस साल मई में चक्रवाती तूफान फानी ने करीब 9000 करोड़ रुपये का नुकसान किया और करीब 1.5 करोड़ लोगों को विस्थापन पर मजबूर किया.सारे तूफानों का निशाना भारत का पूर्वी तट रहा. तमिलनाडु से लेकर आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इनका असर दिखा. समंदर का तापमान जैसे-जैसे बढ़ेगा, वैसे-वैसे साइक्लोन ज्यादा संख्या में और ज्यादा विनाशकारी रूप में आएंगे.

पिछले साल छपी IPCC की स्पेशल रिपोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि धरती का तापमान अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो अगले 10 सालों में भयानक विनाशलीला शुरू हो जाएगी. रिपोर्ट कहती है कि भारत जैसे देशों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा. भारत की हिमालय पर्वत श्रंखला में करीब 10 हजार ग्लेशियर हैं, जो बढ़ते तापमान की वजह से पिघल रहे हैं. हमारी समुद्र तट रेखा करीब 7500 किलोमीटर लंबी है और तटों पर 25 से 30 करोड़ लोग रहते हैं. इनमें में से बहुत सारे खेती और मछली व्यापार के लिए तटों पर निर्भर हैं.

साफ है कि जहां IPCC की रिपोर्ट में भारत के लिए कई स्तर पर तैयारी करने की चेतावनी है, वहीं खुद नीति आयोग कह रहा है कि भारत के 21 शहरों में अगले साल (2020 में) भूजल खत्म हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो देश की 10 करोड़ आबादी के पास कोई पानी नहीं होगा. ऐसे में लू या सूखे की क्या मार होगी इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है.

समुद्र तटों पर देश की 25 से 30 करोड़ आबादी रहती है और समुद्री जल जीवन पर इनमें से बहुतों की रोजी रोटी टिकी है

कुदरत की मार से लड़ने की आर्थिक कीमत भी काफी ज्यादा है. लाखों लोगों को नई जगह पर बसाना, बाढ़, सूखे और जल संकट के मद्देनजर आपदा प्रबंधन करना, खेती के नए तरीके ईजाद करना आसान नहीं होगा. जाहिर है ग्लोबल वॉर्मिंग की मार जो अभी सिर्फ हीटवेव के रूप में दिख रही है, वो देश की तरक्की पर बहुत विपरीत असर डाल सकता है. भारत को अगले 10 सालों में इसके असर से लड़ने के लिए कम से कम 70 लाख करोड़ रुपये चाहिये होंगे. वर्ल्ड बैंक कह चुका है कि जलवायु परिवर्तन की यह मार भारत की जीडीपी पर 2050 तक 2.8 फीसदी की चोट पहुंचा सकती है.

बिहार में लू हो या देश के तमाम हिस्सों में दिख रहा जल संकट. इनके समाधान का रास्ता एक ही है- नदी, जंगल और झरनों जैसे कुदरती संसाधन को बचाना और जल संचय के तरीकों को खोजना. जहां पेड़ों के कटान को रोकना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, वहीं जल संरक्षण के परंपरागत तरीकों (जैसे तालाब और कुओं का निर्माण और बारिश के पानी का संचय) का इस्तेमाल प्रमुख हथियार होने चाहिए.