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आखिर वो कौन है जिसे किताब की तरह रोज़ पढ़ती हैं खूबसूरत रेखा…

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फिल्म उमराव जान में शायरी के उस्ताद उमराव जान से कहते हैं “या किसी को अपना कर लो या किसी के हो लो” इस पर उमराव जान कहती है “कोशिश तो की थी”। पर्दे की उमराव जान और असल ज़िंदगी की रेखा ने भी कोशिश तो कई बार की लेकिन खैर।

मोहब्बत में मिले दर्द से सबको हमदर्दी हो जाती है। फिल्मी पर्दे पर जोड़ियां तो बहुत बनी। इनमें से कुछ ने निजी जीवन में जोड़ी बना ली तो कुछ नाकाम रहे। लेकिन लोगों में चर्चा उन्हीं फिल्मी जोड़ियों की ज्यादा देर तक रहती है जो नाकाम हो गयीं। हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे सफल जोड़ी धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ने 40 से अधिक फिल्में साथ-साथ कीं, लेकन फिर शादी कर ली और बात खत्म हो गयी। मगर रेखा और अमिताभ की जोड़ी की चर्चा खत्म नहीं हो पाती।

रेखा ने जब फिल्मी पर्दे का रुख किया तो वे बच्ची थीं। पहली हिंदी फिल्म सावन भादों रिलीज होते समय वे शरीर से भले ही किशोरी दिखती थीं, लेकिन दिल बच्चों जैसा ही था। दिल का ये बचपना कफी समय तक उनके साथ रहा। तभी तो वे फिल्मी पर्दे के प्रेम और वास्तविक जीवन के प्रेम का फर्क नहीं समझ पायीं। और जब तक वे ये फर्क समझ पातीं सैकड़ों अफवाहें उन्हें अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं।

रेखा डिप्रेशन का शिकार हो गयीं। वे करियर को लेकर लापरवाह और बद दिमाग बन गयीं। लेकिन उनके जीवन में फिर प्यार का अंकुर फूटा और इस बार रेखा को मानो नया जन्म मिल गया। रेखा ने अमिताभ बच्चन के साथ पहली बार साल 1973 में फिल्म नमक हराम में काम किया। जो लोग अमिताभ को करीब से जानते है या उनके साथ काम कर चुके हैं वे अमिताभ के शालीन और अद्भुत आकर्षण के कायल हैं। इसी खूबी ने रेखा को भी प्रभावित किया।

रेखा अमिताभ की अगली फिल्म थी दो अंजाने (1976)। इस, फिल्म के सेट पर कई बार प्यार में धोखा खा चुकीं रेखा ने अमिताभ को दिल दे दिया। अमिताभ शादी शुदा थे। रेखा भी जानती थीं कि अमिताभ जैसे व्यक्तितत्व वाला शख्स पनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता, लेकिन रेखा को इन सबकी परवाह कहां थी वो तो प्यार को पलों को शिद्दत के साथ जीती रहीं। ईमान धरम, खून पसीना, अलाप (1977), गंगा की सौगंध, कस्में वादे, मुकद्दर का सिकंदर (1978), नटवर लाल, सुहाग (1979) और राम बलराम (1980) तक रेखा और अमिताभ की जोड़ी पर्दे पर और पर्दे के पीछे भी सुपर हिट साबित हुई।

इस बीच दोनों के रिश्तों को लेकर अफवाहों पर अफवाहें उड़ती रहीं। अमिताभ बहुत संयम से इन अफवाहों का मुकाबला कर रहे थे तो रेखा ने अपने चारों और रहस्य का ऐसा दायरा बना लिया जिसे कोई भेद नहीं सका। सबसे बड़ी हैरानी तो लोगों को ये देख कर हो रही थी कि रेखा के व्यवहार और अभिनय दोनों में जमीन आसमान का बदलाव आ गया था। नयी रेखा एक आत्मविश्वासी, गंभीर और अधिक आर्कषक रेखा बन चुकी थीं। कहते हैं प्यार अक्सर आदमी को इंसान और इंसान को महान बना देता है। यह बात रेखा पर पूरी तरह खरी उतरी। जिद्दी, बद दिमाग और लापरवाह रेखा की बोलचाल, व्यक्तित्व और अभिनय के तौर तरीकों के पीछे एक खास सोच नजर आने लगी। सेक्स सिंबल कहलाने वाली रेखा ने खूबसूरत, घर, उत्सव और उमरावजान जैसी फिल्मों में जैसा सहज और गंभीर अभिनय किया वह हैरत में डालने वाला था।

सस्ती सनसनी फैलाने वाली भूमिकाओं से हट कर अब रेखा को चैलेंजिंग रोल मिलने लगे। उधर, रेखा और अमिताभ के रिश्ते राष्ट्रीय दिलचस्पी का विषय बने रहे। सिलसिला (1981) वह अंतिम फिल्म थी, जिसमें रेखा और अमिताभ ने एक साथ काम किया। शायद घर टूटने से बचाने के लिये अमिताभ ने ही रेखा से सम्मानजनक किनारा कर लिया। लेकिन रेखा को इस बात का भी फर्क नहीं पड़ा वो तो प्यार के लम्हों को जीना चाहती थीं और अमिताभ से दूर रह कर भी रेखा प्यार की कैद से आजाद नहीं हुईं। अक्सर समारोहों में अमिताभ और रेखा का आमना सामना होने वाले लम्हे भी आते हैं। दोनों बहुत गरिमा के साथ उन लम्हों को जी रहे हैं।

अमिताभ से दूरी के बाद जब-जब रेखा से अमिताभ के बारे में पूछा गया तो उन्हें यह कहने में हिचक नहीं हुई कि वे अमिताभ से प्यार करती हैं। अपने एक इंटरव्यू में एक बार रेखा ने कहा था कि अमित जी एक किताब की तरह हैं। और रेखा आज भी इस किताब को पढ़ती रहती हैं।