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धारा 370 हटने के बाद लगी पाबंदियों से डिप्रेशन के शिकार हुए कश्मीरी, एक मनोचिकित्सक के गुप्त दौरे से खुलासा

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धारा-370 निरस्त किए जाने के बाद जम्मू कश्मीर के बाशिंदे बेहद ज्यादा अवसादग्रस्त और गहरे तनाव का शिकार हैं। अच्छी हालात और मुनासिब इलाज के अभाव में अवसाद और तनाव घाटी में महामारी का रूप अख्तियार कर रहा है। इसकी पुख्ता और तथ्यात्मक जानकारी पंजाब के प्रतिष्ठित डॉक्टर अरुण मित्रा ने जम्मू कश्मीर के गुप्त दौरे से लौटकर दी है।

डॉक्टर अरुण मित्रा परमाणु हथियारों के खात्मे के लिए काम कर रही डॉक्टरों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संगठन इंटरनेशनल फिजीशियन फॉर दी प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वार (आईपीपीएन डब्लयू) के सह अध्यक्ष भी हैं और पंजाब के चिकित्सा एवं बौद्धिक जगत में अपनी अलग ख्याति रखते हैं। नवजीवन से लुधियाना में विशेष बातचीत में डॉक्टर अरुण मित्रा ने बताया कि लगभग एक महीने पहले उन्होंने अलायंस ऑफ डॉक्टर फॉर एथिकल हेल्थकेयर (एडीईएच) के पदाधिकारी की हैसियत से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर कश्मीर घाटी के संवेदनशील करार दिए गए कई इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का जायजा लेने की अनुमति मांगी थी। लेकिन लगातार निवेदन करने के बाद भी कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने बगैर इजाजत, गुप्त रूप से कश्मीर जाने का फैसला किया और गए।

फोटो: अमरिक

डॉक्टर अरुण मित्रा ने बताया कि सरकारी दावों के विपरीत कश्मीर के हालात बेहद ज्यादा खराब हैं और आम लोगों का जीवन हर लिहाज से नरक बना हुआ है। 70 दिनों से लागू सरकारी प्रतिबंधों के चलते लोगों की आर्थिक स्थिति खराब है। सरकारी-गैर सरकारी दहशत आवाम के मनों पर इस कदर हावी है कि वह गंभीर रूप से बीमार हो रहे हैं। ज्यादातर बीमारियां दिल और दिमाग से जुड़ी हैं।

डॉक्टर मित्रा के मुताबिक, बच्चे, नौजवान, किशोर, महिलाएं और बुजुर्ग सभी के सभी तनाव और अवसाद में है। मानसिक तनाव जिस तरीके से वहां बढ़ रहा है, आने वाले वक्त में मानसिक रोग कश्मीर में महामारी का रूप ले लेंगे। डॉक्टर अरुण मित्रा ने नवजीवन से कहा कि लोगों के दिलों-दिमाग में यह धारणा पक्की हो गई है कि उनके साथ बहुत बड़ा धोखा किया गया है। वे शिकस्त की भावना का शिकार हैं। अब लोग एक दूसरे से बातचीत करने से भी कतरा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में कुछ दिन बिताकर आए डॉक्टर मित्रा ने बताया कि घाटी के लोग कहते हैं कि सरकारी सुरक्षा एजेंसियों ने 11, 000 से भी ज्यादा लोगों को हिरासत में लेकर बाहर की जेलों में रखा हुआ है और उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं। इस तरह की चर्चाएं लोगों का रोष, तनाव और अवसाद बढ़ा रही हैं। 70 दिनों से बच्चे स्कूल नहीं जा रहे। बच्चों, बुजुर्गों में अवसाद और तनाव से जुड़ी बीमारियों के लक्षण ज्यादा पाए गए। बच्चे अपने साथियों से एकदम कटे हुए हैं।

सरकारी दावे हैं कि स्कूल कॉलेज खुल गए हैं लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को दहशत के चलते भेज नहीं रहे। डॉक्टर अरुण मित्रा ने बताया कि कश्मीर में गंभीर मरीजों का भी अपने डॉक्टरों से संपर्क नहीं हो पा रहा और जरूरी दवाइयों के भी किल्लत है। केवल लैंडलाइन फोन काम कर रहे हैं। ऐसे फोन तादाद में कम तो है ही, तकनीकी गड़बड़ी भी आम है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था स्थगित होने से बीमार लोगों को अस्पताल जाकर डॉक्टरों से मिलने में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं। आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं का तो मानों वजूद ही खत्म हो गया है। कैंसर, शुगर तक की दवाइयों का जबरदस्त अभाव है। मेडिकल उपकरण नहीं आ रहे। क्योंकि घाटी से पैसों का ट्रांजैक्शन एकदम रुकी हुई है और बाहर से सामान नहीं आ रहा। कश्मीर का मेडिकल सिस्टम काफी हद तक बाहरी दुनिया के साथ इंटरनेट के जरिए बना हुआ था, अब सब कुछ बंद है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात क्या होंगे।

डॉक्टर मित्रा के मुताबिक, हर तरह का कारोबार ठप है और लोगों ने जो राशन पानी इकट्ठा किया था, वह खात्मे की ओर है। कुछ दिन बाद हालात भुखमरी के होंगे। डॉक्टर मित्रा के मुताबिक कश्मीर की फौरी तौर पर तल्ख हकीकत तो यही है। डॉक्टर अरुण मित्रा का कहना है कि कश्मीरियों को तनाव और अवसाद की महामारी का बड़े पैमाने पर शिकार होने से बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। ऐसा तभी संभव है, जब मानवाधिकार बहाल हों और बंदियों को रिहा किया जाए। संवाद के जरिए समस्या का समाधान तलाशा जाए। लोगों का खोया विश्वास जीतना निहायत जरूरी है, नहीं तो भविष्य में हालात बेहद खराब होंगे।

डॉक्टर मित्रा कहते हैं कि कश्मीर के मौजूदा हालात के चलते भारत-पाक संबंध काफी ज्यादा तनावग्रस्त हो गए हैं। खतरनाक आशंकाएं इसलिए भी जन्म ले रही हैं कि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं। उनके इस्तेमाल का खतरा भी बरकरार है। युद्ध की कैसी भी स्थिति में कम से कम 2 अरब लोग दुनिया भर में भुखमरी का शिकार होंगे और कश्मीर इस अलामत में एक बड़ा पहलू होगा। इसलिए हालात को सामान्य बनाने की और भी ज्यादा जरूरत है।