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क्या होता है फिस्कल डेफिसिट, क्यों सरकार करती है इसे ट्रैक, क्या कुछ कह रहे हैं अप्रैल-मई के आंकड़े

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केंद्र सरकार के वित्तीय खातों की निगरानी करने वाली संस्था महालेखा नियंत्रक यानी सीजीए ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती दो महीनों के आंकड़े जारी कर दिए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल और मई के दौरान देश का राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट 1.62 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है. यह स्थिति साफ दर्शाती है कि नए वित्त वर्ष की शुरुआत से ही सरकार की खर्च करने की रफ्तार काफी तेज बनी हुई है, जिसके चलते शुरुआती साठ दिनों में ही सालाना बजटीय लक्ष्य का करीब दस प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका है.
इस बार के आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ मई के महीने में देखने को मिला, जब टैक्स और अन्य माध्यमों से हुई बंपर कमाई की बदौलत सरकार को दो लाख करोड़ रुपये का शुद्ध सरप्लस यानी अधिशेष हासिल हुआ. हालांकि, मई की इस छप्परफाड़ आमदनी के बावजूद सरकार अप्रैल महीने में हुए बड़े घाटे के असर को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकी, जिसके कारण पहले दो महीनों का संयुक्त नतीजा अंततः घाटे के रूप में ही सामने आया है.

आम जनता की भाषा में कहें तो राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट सीधे तौर पर सरकार की उधारी को दर्शाता है. जब सरकार की कुल कमाई यानी टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आमदनी, उसके द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च के मुकाबले कम रह जाती है, तो उस अंतर को पाटने के लिए सरकार को बाजार या अन्य माध्यमों से कर्ज लेना पड़ता है. इसी कुल कर्ज की जरूरत को राजकोषीय घाटा कहा जाता है. अप्रैल और मई के महीनों में सरकार की कुल प्राप्तियां 7.19 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि उसका कुल व्यय 8.81 लाख करोड़ रुपये (बजट अनुमान का 16.5 प्रतिशत) पर पहुंच गया, जिसके कारण यह 1.62 लाख करोड़ रुपये का अंतर पैदा हुआ है.
सरकार क्यों ट्रैक करती है
कोई भी देश अपनी मर्जी से जितना चाहे उतना खर्च नहीं कर सकता, इसलिए सरकार राजकोषीय घाटे को बहुत बारीकी से ट्रैक करती है क्योंकि यह देश की अंतरराष्ट्रीय साख से जुड़ा मामला है. यदि घाटा एक तय सीमा के भीतर रहता है, तो दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां देश की इकोनॉमी को मजबूत मानती हैं और विदेशी निवेशक बिना किसी डर के देश में पैसा लगाते हैं. इसके विपरीत, यदि घाटा लगातार बढ़ता रहे तो यह संकेत देता है कि देश अपनी क्षमता से अधिक कर्ज ले रहा है, जिससे वैश्विक बाजार में देश की छवि पर बुरा असर पड़ता है और सरकार के लिए नया कर्ज लेना बेहद महंगा हो जाता है.

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