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काश! मैं मैडम का कुत्ता होता

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सामने वाली कोठी की बालकनी में मैडम रोज सुबह नहा धो कर बाल संवारती आ खड़ी होती थीं. उनके साथ उनका प्यारा डौगी झक सफेद बालों और काली-काली आंखों वाला कभी उनकी गोद में चढ़ कर उनके गालों को चूमता तो कभी उनके कोमल मुलायम हाथों से बिस्कुट खाता नजर आता था. मैं दोनों के इस प्रणय सीन को देखने के चक्कर में सुबह छह बजे ही अपने मकान की छत पर दूरबीन लेकर चढ़ जाता था. कभी मैडम सुबह सवेरे ही नहा-धोकर बालकनी में निकल आतीं, तो कभी आने में नौ-दस भी बजा देती थीं.

मगर मैं था कि जब तक डौगी को उनका मुंह चाटते नहीं देख लेता, दिल को सुकून नहीं मिलता था. इस प्रणय दृश्य को देखकर मैं खूबसूरत कल्पनाओं से सराबोर हो जाता था. फिर भले ही देर हो जाने पर ऑफिस जाकर बड़े साहब की घुड़कियां खानी पड़ें, जो अक्सर मैं खाता ही था, आदत हो गई थी.मैं जब अपने छोटे से कस्बे से इस शहर में नौकरी की तलाश में आया था, तो चलते वक्त मां ने नसीहत की थी, बेटा कुछ भी हो जावे, सुबह नहा-धोकर पूजा करना और सूर्य भगवान को जल देना मत भूलना. मैं एक पेटी में कुछ कपड़े और एक झोले में कुछ बर्तन-भांडे लिए कई दिन इस अनजाने शहर में मकान की तलाश में भटकता रहा. किसी ने बताया कि कोई एलआईजी मकान देख लो, किराया कम होता है.

यहां कैंट एरिया खत्म होते ही सड़क के एक ओर रईसों की बड़ी-बड़ी कोठियां बनी हैं. बेहद खूबसूरत, नक्काशीदार कोठियां, दुमंजिली, तिमंजिली, बड़ी बड़ी बालकनी वाली, फूलों से सजे सुंदर गार्डन ऐसे कि निगाह ही न हटे. वहीं सड़क के दूसरी ओर एलआईजी मकानों की लम्बी कतार है. बेरंग, टूटे फूटे, गंदे और सीलन भरे कमरों वाले. इसी में से एक जर्जर बदसूरत सा मकान मैंने किराए पर ले लिया. मां की नसीहत थी सो पूजा पाठ के लिए एक कोने में रंगीन पन्नी चिपका कर भगवान जी के रहने का बंदोबस्त भी कर दिया. सूर्य भगवान को जल देने सुबह छत पर जाने लगा. एक दिन मोहतरमा अपने डौगी को गोद में लिए बालकनी में खड़ी दिखाई दीं. दूर से दृश्य बहुत साफ नहीं था, मगर निगाहें अटक गई. इतना तो दिख ही रहा था कि डौगी जी उनकी गोद में मचल मचल कर उनके गालों पर बार-बार अपना मुंह लगा रहे थे. दूसरे दिन भी कुछ ऐसा ही दृश्य. तीसरे दिन तो मैं दृश्य को स्पष्ट देखने के लिए बाजार से दूरबीन ले आया. दूरबीन आंखों पर चढ़ा कर दोनों की प्रेम लीलाओं का आनंद लेने लगा. यह मेरा रोज का काम हो गया.

एक दिन शाम को लौटते समय मैंने कोठी के दरबान को सलाम ठोंक दिया. उसका सीना साहब की तरह चौड़ा हो गया. मारे खुशी के स्टूल से उठ कर मेरे पास आया. मैंने उससे यूं ही माचिस मांग ली. दरअसल मेरी मंशा कुछ और थी. उसने माचिस दी तो मैं बोला, ‘सामने ही रहता हूं. इधर से रोजाना निकलना होता है.’ उसने सिर हिलाया. मैं आगे बढ़ गया. धीरे-धीरे मैं रोज ही किसी न किसी बहाने उसके पास रुकने लगा. फिर तो कभी-कभी वह चाय भी पिलाने लगा. दोस्ती हो गई. उसी से मुझे मैडम के कुत्ते का नाम पता चला. क्यूपिड. बड़ा क्यूट नाम था. एक दिन मैंने पूछा, ‘मैडम सारे दिन क्यूपिड के साथ रहती हैं?’ मेरा सवाल पूछना ही था कि उसने पूरा कुत्ता पुराण सुना डाला. बोला, ‘अरे भाई, वह कुत्ता नहीं, उनका सगेवाला ही समझो. एसी में रहता है. कार में घूमने जाता है. जॉनसन साबुन से नहाता है. बढ़िया चिकेन करी और ब्रेड खाता है. फुल क्रीम मिल्क पीता है. मैडम से इतना प्यार करता है कि साहब भी कभी न कर पाए. साहब का मैडम से झगड़ा भी इसी के कारण हुआ. अब साहब अलग बेडरूम में सोता है और मैडम क्यूपिड के साथ डबल बेड पर अलग बेडरूम में रहती हैं. कुत्ते पर जान देती हैं. मजाल है कोई उनके क्यूपिड को कुत्ता कह दे..’

कुत्ता पुराण सुन कर मैं हैरान रह गया. जलन के मारे सीना फुंकने लगा, कानों से धुंआ निकलने लगा और मुंह से निकला, ‘काश मैं मैडम का कुत्ता होता.’