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शरीर में प्रदूषण का पता लगाने के लिए देश का पहला केंद्र एम्स में शुरू

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दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार दिल्ली में अब प्रदूषित कणों का पता आसानी से चल सकेगा। हर साल दिल्ली में वायु प्रदूषण की वजह से हजारों लोग अस्पतालों में भर्ती होते हैं। जबकि कई लोगों की मौत तक के दावे किए गए हैं। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने दवा किया था कि जहरीली हवा की वजह से दिल्ली निवासी एक 28 वर्षीय युवती को फेफड़ों का कैंसर है। अमर उजाला ने बीते 30 जुलाई को इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया था। हालांकि अभी तक मानव शरीर में प्रदूषित कणों की मौजूदगी का पता लगाने के साथ इलाज करने की तकनीक नहीं आई है। लेकिन पहली बार एम्स में इस तरह की तकनीक को लेकर सेंटर स्थापित किया गया है। इस केंद्र में रक्त और यूरिन की जांच के आधार पर ही शरीर में मौजूद पीएम 2.5 और पीएम 10 के सूक्ष्म कणों के प्रभाव का पता लगाया जा सकेगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर एम्स के डॉक्टर फिर मरीजों का उपचार कर सकेंगे। 

वायु प्रदूषण के अलावा भोजन और पानी के प्रदूषण को लेकर भी यहां अध्ययन किए जा सकेंगे। साथ ही यहां जहरीले तत्वों या कीटनाशकों से जुड़ी दवाओं के दुष्प्रभाव की जांच भी हो सकेगी। इस सेंटर का नाम इकोटॉक्सिकोलॉजी रखा है। इस सेंटर में पानी और भोजन के अलावा वायु प्रदूषण से शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव इत्यादि पर अध्ययन किया जाएगा। 

एम्स का दावा है कि अभी तक देश के किसी भी अस्पताल में इस तरह की तकनीक नहीं आई है। प्रदूषण के अलावा इस सेंटर में जहरीले तत्वों को लेकर भी उपचार तलाशा जाएगा। 

शुक्रवार को एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने बताया कि प्रदूषण के कारण पूरी दुनिया में जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा पैदा हुआ है। पानी, हवा और मिट्टी में हानिकारक तत्व होने के कारण हर साल दुनिया भर में करीब 90 लाख लोगों की मौत हो जाती है। 

अभी तक दुनिया भर में विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम चिकित्सीय अध्ययन तक इसका दावा कर चुके हैं, लेकिन भारत में अभी भी प्रदूषण को लेकर चिकित्सीय क्षेत्र में ज्यादा काम करने की जरूरत है। 

डॉ. गुलेरिया ने बताया कि इस सेंटर की मदद से आने वाले वक्त में प्रदूषण को लेकर बड़ी कामयाबी देश के चिकित्सीय क्षेत्र को मिलने की उम्मीद है। माना जाता है कि वे पर्यावरण के जहरीले तत्वों, हैवी मेटल्स के कारण होती हैं। जानकारों की मानें तो कुछ राज्यों में आर्सेनिक, मरकरी, कैडमियम, फ्लोराइड, यूरेनियम, आयरन और अन्य जहरीले तत्व भूमिगत पानी के कारण होते हैं। 

इन तत्वों के लगातार संपर्क में रहने से किडनी, कैंसर, हृदय की बीमारी, हाइपरटेंशन, जन्मजात बीमारियां, आर्थराइटिस मिर्गी, ऑटिज्म और पार्किंसन का खतरा बढ़ जाता है। 

एम्स के वरिष्ठ डॉ. ए शरीफ ने बताया कि इस सेंटर के जरिए कीटनाशक दवाओं के प्रभाव के बारे में भी पता चलेगा। पंजाब का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि वहां के कुछ इलाकों में पानी में यूरेनियम की मात्रा अधिक होने से कैंसर के मामले अधिक सामने आते हैं। वहीं कुछ जगह देखा गया है कि भूजल में फ्लोराइड के मिलने से लोगों को दिल की बीमारियां हो रही हैं। 

भारी धातु की शरीर में मौजूदगी का चलेगा पता
एम्स के डॉ. जावेद कादरी बताते हैं कि एम्स ने एक आईसीपीएमएस नामक मशीन भी इस सेंटर में लगाई है जोकि ब्लड और यूरिन की जांच करके शरीर में मौजूद भारी धातु के बारे में पता लगा सकेगी। जिसके आधार पर मरीजों का उपचार भी आसान होगा। इसके अलावा घर से पानी के नमूनों की जांच भी की जाएगी।