Home छत्तीसगढ़ श्रद्घालु हाथों से खिलाते हैं प्रसाद, छत्तीसगढ़ के इस मंदिर में देवी...

श्रद्घालु हाथों से खिलाते हैं प्रसाद, छत्तीसगढ़ के इस मंदिर में देवी दर्शन के लिए आते हैं भालू

All PDF Reader 20260626 00.30.11_page-0004
All PDF Reader 20260626 00.30.11_page-0001
All PDF Reader 20260626 00.30.11_page-0002
All PDF Reader 20260626 00.30.11_page-0003
IMG-20240704-WA0019
IMG-20220701-WA0004
WhatsApp-Image-2022-08-01-at-12.15.40-PM
1658178730682
WhatsApp-Image-2024-08-18-at-1.51.50-PM

 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-53 किनारे पटेवा और झलप के बीच पहाड़ी पर स्थित है मुंगईमाता का मंदिर। पहाड़ी के नीचे भी एक कुटी में मुंगईमाता की पाषाण प्रतिमा स्थापित है,जो जनआस्था का केंद्र है। यहां भालू रोज आते हैं। श्रद्घालुओं के द्वारा प्रसाद, बिस्किट और मूंगलफली आदि खिलाने से भालुओं के भोजन का इंतजाम हो जाता है। इसके चलते यहां भालू बीते कई वर्षों से हर रोज शाम के समय आ रहे हैं। जंगली भालुओं के रोज-रोज यहां स्वच्छंद विचरण करने से देवी दर्शन करने और भालुओं को करीब से देखने वालों का तांता लगने लगा है। मुंगईमाता पहाड़ी की गुफाओं से निकलकर दो बड़े और दो बधो भालू रोज यहां आते हैं। इन भालुओं को देखने दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-53 से गुजरने वाले मुंबई से लेकर कोलकाता तक के लोगों का यह आस्था का केंद्र बन गया है। भालुओं की एक झलक पाने और भालुओं को अपने हाथों से बिस्किट आदि प्रसाद खिलाने के लिए यहां जरूर रुकते हैं।

भालुओं की कहानी-पुजारी की जुबानी

मुंगईमाता मंदिर-बावनकेरा के पुजारी टिकेश्वर दास वैष्णव बताते हैं कि यहां पर भालू कब से आ रहे हैं, सही-सही जानकारी किसी को नहीं है। कोई सात-आठ साल बताते हैं तो कोई बीस साल से यहां भालुओं के आने की बात कहते हैं। इतना जरूर है कि जब से वे यहां बीते करीब आठ-दस साल से पुजारी हैं, तब से भालू नियमित शाम चार से छह बजे के बीच आते हैं। करीब सालभर पहले जब भालू अपने छोटे बधाों को लेकर मंदिर तक आने लगे तब दयाभाव से उनके लिए कुछ खाने और पीने का इंतजाम करना पुजारी ने प्रारंभ किया। इसके बाद भालू इस कदर घुल-मिल गए कि जैसे ही शहद की तरह स्वाद वाले सॉफ्ट ड्रिंक इन्हें पिलाते हैं, वह पुजारी के शरीर से लिपट जाता है। जब तक माजा का बाटल खत्म नहीं होता है, भालू पुजारी को छोड़ता ही नहीं है।

ग्रामीण बताते हैं-भालू नहीं पहुंचाते हैं किसी को नुकसान

पास के गांव दर्रीपाली निवासी युवा ईश्वर सिंह ध्रुव बताते हैं कि मुंगईमाता, बावनकेरा के इस मंदिर में भालू सात-आठ साल से आ रहे हैं। मंदिर के पास मिलने वाले प्रसाद से प्रभावित होकर आते हैं। उन्हें खाने-पीने को मिलता है, इसलिए आते हैं। श्रद्घालुओं की देवी भक्ति के साथ ही भालुओं के साथ आस्था जुड़ी हुई है। जन आस्था है कि ये भालू देवी के भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि माता की कृपा से यहां भालू आते हैं और अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। हाथ से प्रसाद खिलाने के बावजूद अब तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। हालांकि एहतियात के तौर पर यहां वन विभाग ने तार जाली लगा रखा कि हिंसक श्रेणी के वन्यजीव ये भालू किसी को नुकसान न पहुंचाएं।

महासमुंद जिले के बागाबाहरा के पास घुंचापाली पहाड़ी में भी भालू वर्षों से आ रहे हैं। वह आवागमन क्षेत्र से दूर शांत और पहाड़ी इलाका है। इसके विपरित नेशनल हाईवे से लगे हुए मंदिर में भालुओं की नियमित आमद आश्चर्यजनक और जनआस्था का केंद्र बना हुआ है।

सेल्फी लेने और हाथ से प्रसाद खिलाने वालों का तांता

मुंगईमाता पहाड़ी से जैसे ही भालू नीचे उतरकर बाबा की कुटी तक आते हैं,यहां देवी दर्शन के साथ ही भालू देखने वालों का तांता लग जाता है। छोटे बधाों से लेकर युवा और बुजुर्ग सभी वर्ग के लोग भालुओं की अठखेलियों को कैमरे में कैद करने और अपने हाथों से इन्हें प्रसाद खिलाने आतुर नजर आते हैं।

आखों देखीः- नर भालू पुजारी की कुटी में प्रवेश कर जाता है, खाता है हाथ से प्रसाद

भालुओं के इस दल में सबसे बड़ा और नर भालू पहाड़ी से उतरकर सीधा पुजारी के कुटी में प्रवेश करता है। फिर पुजारी उसके खाने-पीने के इंताजाम में लग जाते हैं। वह कुटी में प्रवेश कर जाता है तो पुजारी उसे अपने हाथों से ढकेलकर बाहर निकालते हैं। नारियल, इलायचीदाना का प्रसाद खिलाते हैं और उसके लिए पानी इंतजाम करने निकल जाते हैं। इस बीच कुटी के बाहर भालू को ेदेखने श्रद्घालुओं का तांता लगा रहता है। बधाों-बड़े के बीच भालू चाव से प्रसाद खाते हैं। किसी को नुकसान पहुंचाए बिना ही शाम ढलते और अंधेरा होते ही पहाड़ी की ओर लौट जाता है।