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नीरज की कविता वह चमकता पत्थर है, जिसके निर्माण में सदियों की पीड़ा का श्रम शामिल है- चिराग जैन

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आज 19 जुलाई को गीतकार गोपालदास नीरज की पुण्यतिथि पर उनका गीत याद आता है, ‘इतने बदनाम हो गए है हम जमाने में, तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में’. सचमुच, नीरज जी हिंदी साहित्य का वह चमकता सूरज हैं जो सदियों तक गीत, गज़ल की दुनिया को रोशन करता रहेगा.

Gopal Das Neeraj Death Anniversary: बीसवीं सदी की समग्र गुनगुनाहट की कहानी जिस एक जिल्द में सिमट कर पूर्ण होती है उसका शीर्षक है – “गोपालदास नीरज”! पीड़ा की अनुभूति को उत्सव के शिल्प में अभिव्यक्त करते किसी भरपूर गीत की जन्मकुंडली बनाई जाए तो वह नीरज की जन्मकुंडली होगी.

नीरज का जीवन एक ऐसा बेहतरीन उपन्यास है, जो अनेक रोचक लघुकथाओं से मिलकर बनता है. नीरज की कविता किसी चमचमाते हुए पत्थर का वह टुकड़ा है, जिसके निर्माण में सदियों की पीड़ा का श्रम सम्मिलित है. वे अक्सर कवि-सम्मेलन के मंच पर एक शेर पढ़ते थे- “इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, तुमको लग जाएंगी सदियां, हमें भुलाने में” इसे पढ़ते समय उनके अधर एक विशेष मुद्रा में खिल-खिल जाते थे और आंखों में एक उपहास ठहाका लगाने लगता था. ऐसा जान पड़ता था, मानो वे अपने कष्टों की पराजय पर जीत का जश्न मना रहे हों.

गीतकार होने के लिए पीड़ा को जिस सीमा तक सुर-ताल के तटबंध का भान होना चाहिए, दर्द को जिस सलीके से छंद की यति-गति का शऊर आना चाहिए वह नीरज जी के यहां खूब समझ आता है. वे अपने हर गीत में किसी अमूर्त से बतियाते नजर आते हैं. इस अमूर्त की बिल्कुल सही पहचान कर पाना असंभव है. कभी वे भाग्य की आंखों में आंखें डाल कर अपनी फक्कड़ बेफिक्री का बयान दर्ज कराते हैं, तो कभी एक नजर में सारे जमाने को चिढ़ाते हुए अपनी गुनगुनाहट पर इतराने लगते हैं. कभी समस्याओं का गिरेबान पकड़कर समाधान का परिचय-पत्र दिखाते फिरते हैं तो कभी निराशा पर ठहाका लगाते हुए जिजीविषा के हस्ताक्षर जड़ देते हैं.

नीरज का विफल प्रेमी भी अपने प्रयासों की शत-प्रतिशत ईमानदारी के एहसास से भरकर संतुष्टिलोक के किसी दुर्लभ आनंद में निमग्न दीख पड़ता है. नीरज का समर्पण उनके प्रेम को देह से विदेह तक की यात्रा कराने में समर्थ है. वे सौंदर्य की पोर-पोर को भोगते हुए भी अपनी कविताओं के ऋष्यमूक पर उसकी लिप्सा के प्रकोप से अछूते रह पाते हैं.

नीरज की जवाबदेही स्वयं के प्रति है. वे अपने किसी कृत्य अथवा विचार के लिए सफाई पेश नहीं करते. वे अपनी प्रत्येक श्वासोच्छवास के लिए अपने आप के सम्मुख कोई अकाट्य तर्क लेकर प्रस्तुत होते हैं. उनकी इसी प्रवृत्ति के आगे मृत्यु भी उनके एक इशारे पर दोनों हाथ बांधे उनके अंतिम गीत के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर लेती है. उनकी इसी अलमस्त फकीरी के सम्मोहन में मृत्यु का दूत भी अपना कर्त्तव्य बिसार कर कई वर्ष तक यह गीत सुनता रहता है कि :

बाद मेरे जो यहां और हैं गाने वाले
सुर की थपकी से पहाड़ों को सुलाने वाले
उजाड़ बाग, बियाबान, सूनसानों में
छंद की गंध से फूलों को खिलाने वाले
उनके पैरों के फफोले न कहीं फूट पड़ें
उनकी राहों के जरा शूल हटा लूं, तो चलूं
ऐसी क्या बात है, चलता हूं अभी चलता हूं
गीत इक और जरा झूम के गा लूं, तो चलूं

…गाते गाते, सचमुच चले गए नीरज जी! उनके बाद छंद की गंध से फूलों को खिलाने वाले उदास हैं. उनके बाद सुर की थपकी से पहाड़ सो नहीं पा रहे हैं लेकिन उनके गीत इस उदासी में उनके अमरत्व की तान छेड़कर दिलासा देते हैं : “छुप-छुप अश्रु बहाने वालो मोती व्यर्थ लुटाने वालो, कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है.”