Home धर्म - ज्योतिष छत्तीसगढ़ का खजुराहो : भोरमदेव

छत्तीसगढ़ का खजुराहो : भोरमदेव

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भोरमदेव नागर शैली के मंदिरों की परंपरा में बना हुआ छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है।कला विन्यास की दृष्टि से अर्ध मंडप इसी के साथ लगा हुआ अंतराल, अंत में गर्भगृह है ।9 फीट का वर्गाकार गर्भ गृह 5 सीढ़ियां उतरकर बना हुआ है। गर्भ गृह में शिवलिंग प्रतिष्ठित है। यहीं पर काले ग्रेनाइट पत्थरों की कई मूर्तियां हैं जो संभवत बाद में यहां स्थापित की गई होंगी।

मंदिर के शिखर की बनावट ,अंग शिखर की बहुलता खजुराहो की शैली को याद दिलाती है। द्वार के ऊपर शिखर में एक वृत्ताकार गवाक्ष है। शिखर भाग पंक्ति बद्ध अंग शिखरों से युक्त है जो ऊपर की ओर कम संकरा होता चला गया है। मंदिर कलश विहीन है। मंदिर के बाहरी भाग में कामकला को प्रदर्शित करतीं मनोहारी झांकियां हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर मंदिर का निर्माण नागवंशी शासक गोपाल देव के राज्य काल में हुआहै।

मंदिर के गर्भ गृह में नाग की प्रतिमा स्थापित है। यहीं पर दाढ़ी युक्त योगी की एक मूर्ति पर संवत 840 उत्कीर्ण हैं अर्थात मंदिर का निर्माण काल सन 10 89 को माना जा सकता है। भोरमदेव मंदिर से कुछ दूरी पर छेरकी महल है जहां गर्भ गृह में शिवलिंग है लेकिन मंदिर की सारी मूर्तियां निकाल दी गई मालूम होती हैं। मड़वा महल छेरकी महल से लगभग 1 किलोमीटर दूर पर स्थित है। मड़वा महल में विवाह विवाह मंडप की भी कल्पना की जा सकती है ,इसका आकार भी ऐसा है।

इस मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा रामचंद्र देव द्वारा सन 1349 में कराया गया था। कला विन्यास की दृष्टि से इसके 2 अंग, मंडप और गर्भगृह हैं। मंडप आयताकार 16 अलंकृत स्तंभों पर टिका है। प्रवेश द्वार के चौखटों पर पुष्प वल्लरियां अलंकृत है। यहां चतुर्भुजी शिव खड़े हैं और उनके ऊपर मानव रूप में छात्र युक्त नागराज अंजलीबद्ध व समर्पण की मुद्रा में विराजमान हैं। पाश्र्व में घट धारणीय कमनीय मूर्ति हैं। मंदिर के कटिभाग की दो पट्टियों में मिथुन दृश्य अंकित हैं। यहां स्त्री पुरुषों के दृश्यों के साथ, स्त्री पुरुष अपने गुप्तांगों का प्रदर्शन करते हुए दिखाए गए हैं ।कुछ दाढ़ी मूंछ वाले पुरुष भी काम कला में लिप्त उत्कीर्ण हैं।

मूर्तियों में जीवन क्रम का स्वरूप उभरकर सामने आता है क्योंकि शरीर तो नष्ट हो जाता है और आत्मा ही रह जाती है। शिव शक्ति से मिलन ही मुख्य ध्येय है। इस आध्यात्मिक मिलन का संसारिक रुप मैथुन ही है। संसार चक्र को चलाने के लिए जीवन की पूर्णता का द्योतक का श्रेष्ठ साधन यही है ,जहां से मोक्ष के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। मंदिर में आराधना का परम तत्व विद्यमान है जो इन सब से ऊपर उठकर एकात्म में लीन हो ,जहां राग, व्देष, भय से मुक्त हो मानव परम शक्ति से साक्षात्कार करता है। जीवन के शाश्वत मार्ग को प्रशस्त करते भोरमदेव और मड़वा महल ,छेरकी महल के भग्नावशेष आज भी साक्षी हैं।

द्वारा- रविन्द्र गिन्नौरे