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तीर्थराज प्रयाग महाकुंभ के पावन अवसर पर पुरी पीठाधीश्वर श्रीमद जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान के शिविर मे आयोजितश्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह यज्ञ

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तीर्थराज प्रयाग महाकुंभ के पावन अवसर पर पुरी पीठाधीश्वर श्रीमद जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान के शिविर मे आयोजित
श्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह यज्ञ महा महोत्सव में षष्ठम दिवस की कथा भाग में आचार्य पंडित झम्मन शास्त्री जी महाराज ने रुक्मणी विवाह के मंगल मय प्रसंग मे समस्त भक्तो को सुनते हुए कहा की पेड़ो के बगैर जीवन की कामना दुर्लभ है। जीवन संभव ही नहीं विदेश में नदियां पर्वत पेड़ पौधे को केवल उपभोग की वस्तु ही माना जाता है जबकि भारत देश में जहां नदी और पेड़ों की पूजा होती है। देश में हो रही वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से वायुमंडल एवं प्रकृति को कष्ट होता है इसी प्रकार यह कार्य होता रहा तो विनाश संभव है। हजारों साल पहले ही पता चला कि मानव जाति का अस्तित्व तब तक है। जब तक नदियां , गौ माता, है बच्चे कोई भी त्यौहार हो यदि एक पेड़ रोपने का मन बना लिया जाए तो ,140 करोड़ आबादी वाले इस देश में अरबो खराबो की संख्या में पेड़ पौधे लगाए जा सकते हैं। शास्त्री जी महाराज ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण से हम यह सीख सकते हैं की प्रकृति से कैसे प्रेम किया जाए और भगवान श्री कृष्ण यही संदेश देते हैं। की प्रकृति से प्रेम करें यह प्रभु ने सिखाया है। की पूजा भी आवश्यक है। सनातन धर्म मे प्रभु में बिना प्रकृति के कोई भी अनुष्ठान संपन्न नहीं होते रासलीला की ही ले लो यह लीला गोलोंक की लीला है। व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए। कि अहंकार का अंश मात्र भी उनके अंदर मौजूद न रहे। किसी तरह आडंबर से भी बचना चाहिए ।लोग आराधना के नाम पर पूजा उपासना के नाम पर दूरी बना लेते हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है ।तब जाकर पृथ्वी पर मनुष्य आगामी हजारों वर्षों तक स्वास्थ्य और संपन्न रहेगा । शास्त्री जी ने बताया की भागवत कथा राम कथा की परंपरा साल भर चलती रहे। इसी के बहाने लोग 365 दिन यानी साल भर भागवत से जुड़े साथ ही सनातन धर्म का उत्थान होगा। बाल लीला रासलीला के आनंद के साथ-साथ हमें यह भी समझना है कि शिशुपाल और कंस का वध किन परिस्थितियों में हुआ हमें आती वाचलता, दमनकारी ,हथकंडो से अपने हाथ खींच लेना चाहिए ।तथा रुक्मणी मंगल के पावन उत्सव में मंगल परिणय भगवान लक्ष्मी नारायण स्वरूप रुक्मणी और कृष्ण की पूजन आराधना एवं महाआरती संपन्न हुई।